भीड़ का चुनाव बुद्धिमानी से
(ओशो विचार से कॉपी/एडिट)
तुमने कभी इस बात का गहन निरीक्षण किया है कि तुम कैसे भीड़ में गिरकर उसके साथ हो जाते हो? हिंदुओं की भीड़ मस्जिद को जलाने जा रही है या मुसलमानों की भीड़ किसी मंदिर का विध्वंस करने। तुम वास्तव में मस्जिद जलाने के बारे में नहीं सोचते, तुम मंदिर गिराने के बारे में नहीं सोचते, तुमने तो इस बारे में पहले कभी सोचा ही नहीं था। तुम इस तरह के व्यक्ति हो ही नहीं। तुम उस तरह के विध्वंसक, हिंसक और आक्रामक हो ही नहीं। तुम तो एक भले व्यक्ति हो... तुमने कभी कोई वस्तु या किसी व्यक्ति को नहीं जलाया। और जब तुम भीड़ में सम्मिलित हुए थे, तब वास्तव मेें इस बारे में कुछ करने की सोच भी नहीं रहे थे, तुम्हें तो बस इतनी सी उत्सुकता थी कि यह भीड़ कहां जा रही है? तुम्हारी केवल यह जानने में रुचि थी कि आखिर क्या होने जा रहा है? तुम तो बस एक तरह के मनोरंजन के लिए जा रहे थे।
धीरे-धीरे तुम भीड़ के साथ उत्तेजित होने लगते हो, क्योंकि लोग तुम्हेें चारों तरफ से घेरे हुए हैं। पूरी ऊर्जा के साथ चीखते-चिल्लाते हुए नारे लगा रहे हैं, विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। अब उन सबकी ऊर्जा तुम पर काम करना शुरू कर देती है और तुम्हारी ऊर्जा भी जागने लगती है। धीरे-धीरे तुम पाते हो कि तुम खुद उत्तेजित होने लगे हो। जब उत्तेजना तुम्हारे चारों तरफ व्याप्त है, तो भला तुम कैसे उससे अलग रह सकते हो? तुम भी उत्तेजित हो जाते हो और जब तुम मंदिर या मस्जिद तक पहुंचते हो और लोग उसे ध्वस्त करना शुरू कर देते हैं, उसे आग लगाना शुरू करते हैं, तो तुम अचानक वह सब करना शुरू कर देते हो, जिसकी तुमने कभी कोई योजना ही नहीं बनाई थी।
लोगों को सामूहिक मन द्वारा उन्मत्त किया जाता है। धर्म तो तुम्हारा अनूठा अनुभव है। उसका सामूहिक मन से कोई लेना-देना नहीं। दरअसल, समूह या भीड़ में तुम अपनी पहचान खो देते हो, बल्कि तुम्हारा पतन हो जाता है। धार्मिक अनुभव में भी तुम अपनी पहचान खो देते हो, लेकिन वहां तुम्हारा उत्थान होता है, उन्नयन होता है, तुम ऊंचे उठ जाते हो।
आइए जरा इसका उल्टा करते है यानी एक ऐसे कम्युनिटी/भीड़ का हिस्सा होते है जिनका उद्देश्य समाज की भलाई का होता है, जिनका उद्देश्य लगातार उन्नति करने का है, हम पाएंगे कि उस कम्युनिटी के प्रत्येक सदस्य प्रगति कर रहे है और उस कम्युनिटी का हिस्सा बनकर हम भी आगे बढ़ सकते है। मुंबई लोकल की भीड़ में शामिल हो जाइए, वो भीड़ आपको ट्रेन में बैठा भी देगी, गंतव्य तक पहुंचाकर उतार भी देगी। सिविल सर्विस की तैयारी करने वाले लोगों के साथ हो जाय, यह जरूरी नहीं कि हम भी यूपीएससी का एग्जाम क्लियर कर ले, लेकिन वर्तमान से तो बेहतर हो ही जाएंगे यह तय है।
इसलिए भीड़ का चुनाव बुद्धिमानी से
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