सोमवार, 17 अक्टूबर 2022

कुछ निवेश संबंधी नियम

आज मैंने मनी कंट्रोल पे कई म्यूचुअल फंड स्कीमों का अध्ययन किया जो पिछले 5 सालो से बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे है । इन सबका औसत रिटर्न पिछले पाँच सालो मे प्रति वर्ष 15-23 % का रिटर्न रहा है । इनसे कुछ निष्कर्ष जो दिखे वो इस प्रकार है ---

1-कम से कम 15 सेक्टरों मे पैसा लगाना चहहिए 

2-अपने निवेश का सबसे ज्यादा हिस्सा आईटी, फार्मा और बैंकिंग मे बटना चाहिए
 
3-साल भर से ऊपर के लिए ही शेयर का चुनाव करना चाहिए 

4-साल मे आपका रिटर्न ऋणात्मक हो सकता है लेकिन जैसे ही उससे उपर का समय होता है रिटर्न दिखने लगता है 

5-लॉन्ग टर्म मे मिडकैप स्टॉक बेहतर रिटर्न दे रहे है 

6-कभी भी एक या दो सेक्टर मे पूरा पैसा नहीं डालना चाहिए 

7-फंड का चुनाव हमेशा उसके बेंचमार्क से तुलना करके देखा जाना चाहिए 

8- फंड का रिटर्न  बेंचमार्क से  हमेशा अधिक होना चाहिए 

9- जिस फंड का फंड साइज 500-5000 करोड़ का हो , मे निवेश करना चाहिए 

10- निवेश नियमित रूप से अनुशशित होकर करना चाहिए प्रयास ये करे की अपने मंथली आय से एक छोटा हिस्सा हमेशा लगातार मार्केट मे डाले 

11-जब भी लाभ दिखे मुनाफा जरूर लेना चाहिए और फिर जब मार्केट नीचे आए तो उसे फिर उसी पोर्टफोलियो मे डालना चाहिए 

12-हमेशा निवेश किसी और के कहने मात्र से नहीं करना चाहिए बल्कि उस पर अपना रिसर्च अवश्य करे 

13- ना तो कभी 100% मनी निवेश करे और ना ही 100% मुनाफा वसूली करे 

14 - साल दो साल मे अपने निवेश की एक बार समीक्षा अवश्य करे और जिस फंड / स्टॉक से रिटर्न ना मिले उसे सेल कर उसी सेक्टर के किसी और स्टॉक मे निवेश करे 

और भी बहुत सारी है लेकिन जो चुनिन्दा लगा मैंने लिख दिया । यदि कोई मदद चाहिए तो उसका स्वागत है । धन्यवाद

रविवार, 9 अक्टूबर 2022

वाहन बीमा के मायने

वाहन बीमा के रूप में थोड़े पैसे में बड़ी समस्याओं के समाधान को खरीदना

हमें यदि अपने नुकसान की चिंता नहीं हैं तो कोई बात नहीं, कम से कम हमें उनकी तो चिंता करनी ही चाहिए जिनका हमारे वजह से कोई नुकसान हो सकता है। समाचार पत्रों में आए दिन ऑडी प्रकाशित खबरें मिल जाती है जिसमें एक्सीडेंट के दौरान गाड़ी का बीमा एक्सपायर्ड हो चुका होता है।  अपने देश में ज्यादातर लोग गाड़ी का बीमा और हेलमेट की सुविधा सुरक्षा की दृष्टि से नहीं बल्कि पुलिस चेकिंग से बचने के लिए लेते है। राजनेता है तो उन्हे पुलिस चेकिंग का भय तो है नहीं, फिर काहें का बीमा। 

बहरहाल इसी से मिलता जुलता वर्षों पहले का एक प्रकरण याद आ गया। एक हमारे जानने वाले है, वो फेसबुक पर भी जुड़े हुए है, हालांकि यह घटना शेयर करने से पहर उनकी अनुमति भी नहीं लिया हूं। मित्र का ट्रक चलता था जो एक दिन झारखंड में इनके ट्रक की किसी और ट्रक से आमने सामने की टक्कर हो गई जिसमें एक की मृत्यु हो गई। उनकी बड़ी मुश्किल क्योंकि बीमा था ही नहीं। संकट काल में मुझे फोन किए कि किया क्या जाय। मेरा उनको एक ही राय था, इस पूरे मसले को कानून के दायरे से बाहर ही आपस में बैठ कर समझ लीजिए, फायदे में रहेंगे। उन्होंने औरों से भी राय लिए शायद सभी ने उन्हे यही सलाह दिया और दोनो पक्षों ने अन ऑफिसियल मामले को बाहर ही समझ लिए। इस पूरे समस्या में उनका अच्छा खासा कई लाख रु खर्च हुआ लेकिन सुकून की यह बात थी कि निबट गया वर्ना कानून के झमेले में आए होते तो लंबा झेलते। उन्हे अपने वाहन के मरम्मत में भी खर्च करने पड़े। यदि बीमा को कुछ हजार प्रीमियम वो समय से दे दिए होते तो उन्हे लाखों का नुकसान नहीं होता। और आज उनके ट्रक भी चल रहे होते।

हम मानव है, हम लोग स्वभाव से नजदीक के फायदे और नुकसान को ज्यादा तवज्जो देते है। हमें ऐसा नहीं करना चाहिए, हमेशा दूरगामी सोच रखनी चाहिए। बहुत सारे लोग टर्म प्लान भी नहीं लेते, तर्क होता है उसका क्या फायदा जो मरने के बाद मिले। हम थोड़े से प्रीमियम से बड़ी समस्याओं का समाधान खरीदते है। 
किसी भी वाहन बीमा में मुख्य रूप से 3 चीजे जुड़ी रहती है
1) ड्राइवर का बीमा
2) गाड़ी की टूट फुट या चोरी होने में सुरक्षा और 
3) थर्ड पार्टी सुरक्षा

अब हम इस पर विस्तार से बाते करते है। वाहन बीमा में जो पहली चीज होती है वो ड्राइवर की सुरक्षा। यदि गाड़ी का बीमा होता है और दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो जाती है तो ड्राइवर के परिवार को रू 15 लाख (जहां तक मेरी जानकारी है) मिलता है। बीमा के अभाव में ये नहीं मिलता इसलिए प्रत्येक वाहन स्वामी का दायित्व कि इसे कराए और यदि कोई ड्राइवर को नौकरी पर रखे है तो उसके परिवार की सुरक्षा बढ़ जाती हैं। यदि वाहन बीमा कराते समय एक ऑप्शन और टिक कर दें तो ड्राइवर ही नहीं बाकी सभी सवारियों के जीवन का भी बीमा हो जाता है और बहुत थोड़े से प्रीमियम का ही अंतर आता है।
 दूसरी गाड़ी में टूट फुट होने पर इंश्योरेंस कंपनी द्वारा मरम्मत का एक बड़ा हिस्सा वहन किया जाता है। या गाड़ी चोरी हो जाती है तो गाड़ी की जो वैल्यू होती है, उतना पैसा बीमा कम्पनी द्वारा वाहन स्वामी को मिलता है, ताकि वो उस पैसे से दूसरा वाहन खरीद सके। ये वाला जो फीचर है न ये व्यक्तिगत लाभ और हानि से जुड़ा हुआ है, इसे हम न भी कराए तो भी चल जाएगा। 
अब हम तीसरे प्वाइंट पर आते है जो सभी में सबसे अधिक इंपॉर्टेंट है। होता क्या है कि हमारे गलतियों से किसी की मृत्यु हो जाती है तो उसके जीवन वैल्यू के बराबर पैसा देना होता है जिस बीमा कंपनी द्वारा वहन किया जाता है। जीवन वैल्यू मतलब आने वाले समयों में वह कितना पैसा कमा सकता है, यानी  यह बहुत बड़ी रकम होती है, जिसे व्यक्तिगत तौर पर भुगतान पॉसिबल नहीं होता।

 इस तरह हमारा नैतिक दायित्व है कि कम से कम थर्ड पार्टी इंश्योरेंस तो कराए ही कराए। इसका प्रीमियम भी कम आता है।

Time in market and timing the market

SMART INVESTING क्या है

  बाजार में निवेश करते समय निवेशकों की सबसे बड़ी चिंता ज्यादा रिटर्न का पीछा करने में शामिल जोखिमों को लेकर होती है। मार्केट में शॉर्ट टर्म में जोखिम एक बहुत बड़ा इश्यू होता है जबकि लॉन्ग टर्म यानी 5 साल से अधिक का नजरिया जोखिम कम हो जाता है। बिजनेस जितना ही अच्छा होता है, समय उतना ही बड़ा रिवार्ड देता है। स्मार्ट इनवेस्टर अच्छी तरह जानते हैं कि बाजार को लेकर किसी भी तरह की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती इसलिए वो लोग अपने प्रॉसेस पर ध्यान देते है। इस संबंध में वारेन बफेट का एक कथन काफी लोकप्रिय है कि मार्केट के बारे में एक भविष्यवाणी हो सकती है कि इसके बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं हो सकती। हमें मार्केट की दिशा की भविष्यवाणी या चिंता के बारे में सोचने के बजाय अपने निवेश स्ट्रेटजी पर ध्यान देना है। वैसे भी मार्केट को लॉन्ग टर्म में अंततः बढ़ना ही है। इसलिए ध्यान स्टॉक चुनने और उसमें निवेश के अनुशासन पर होनी चाहिए। ये जितनी अच्छी होगी उतना ही अच्छा लाभ भी मिलेगा। छोटी अवधि में मार्केट में उतार चढ़ाव होना इसका कुल स्वभाव है जिसके कारण किसी भी निवेश पर फायदा या नुकसान हो सकता है लेकिन ज्यादा रिटर्न की चाहने वाले निवेशक लंबी अवधि तक निवेश करना पसंद करते हैं। लेकिन ध्यान यहां यह देना है कि समय अच्छे बिजनेस का मित्र होता है जबकि खराब बिजनेस का शत्रु। यानी बिजनेस अच्छा होगा तो लॉन्ग टर्म नोट छापने की मशीन की तरह से होगा जबकि खराब बिजनेस वेल्थ डिस्ट्रॉय कर देता है। 
अक्सर बाजार में टाइम इन द मार्केट और टाइमिंग द मार्केट को लेकर बहस होती रहती है। कई निवेशक निवेश करते समय किसी स्टॉक के भविष्य के बाजार मूल्य का अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं। इसमें जोखिम काफी ज्यादा होता है लेकिन यदि टेकनिकल एनालसिस सीख लिया जाय तो जोखिम को कम किया जा सकता है। टेक्निकल एनल्सिस के बहुत सारे टूल होते है लेकिन कम जानिए और उसका ज्यादा प्रयोग ज्यादा फायदेमंद होता है। शेयरों के भाव को भविष्य का अनुमान लगाकर निवेश करने की इस रणनीति को ही "टाइमिंग द मार्केट" कहते हैं. इसके उलट, कई निवेशक लंबी अवधि के लिए निवेश करते हैं। ऐसे निवेशक यह अनुमान लगाने की कोशिश किए बिना स्टॉक खरीदते हैं कि बाजार में कब तेजी या मंदी होगी। निवेश की इस रणनीति को टाइम इन द मार्केट कहा जाता है।
 अब सवाल यह है कि दोनों में बेहतर रणनीति क्या है ?

*टाइमिंग द मार्केट*
टाइमिंग द मार्केट का मतलब यह है कि एक निवेशक स्टॉक के भविष्य के शेयर की कीमत का अनुमान लगाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि यह तरीका सोचने में अच्छा लगता है कि कम कीमत पर खरीदो और कीमत ज्यादा होने पर बेच दो और यदि पूर्व के चार्ट देखिए तो यह बड़ा आसान लगता है लेकिन इस तरीके में जोखिम काफी ज्यादा होता है क्योंकि स्टॉक के वर्तमान भाव से अनुमान लगाना मुश्किल होता है कि यहां से वो बढ़ेगा या और घटेगा। इस पूरी प्रॉसेस में अपनी निवेश रणनीति के प्रति अनुशासन बहुत मायने रखता है। प्रायः देखने में आता है कि इस विधि में ज्यादातर लोग भाग्य भरोसे खेल खेलते है, ज्यादातर लोग स्टॉक इसलिए खरीदते है क्योंकि वो गिर चुका होता है। इस तरीके से हो सकता है कि हमारी ‘किस्मत’ अच्छी हो और ज्यादा रिटर्न मिल जाए। ऐसा भी हो सकता है कि किस्मत अच्छी ना हो और काफी ज्यादा नुकसान हो जाए। ये पूर्णतया सत्य है कि स्टॉक मार्केट में भविष्य के बारे में किसी भी तरह का अनुमान नहीं लगाया जा सकता, हमें सिर्फ अपने आइडियोलॉजी पर ध्यान देना है। स्टॉक की कीमतें तेजी के साथ बदलती हैं, इसका मतलब यह है कि आपका अनुमान हमेशा सटीक नहीं हो सकता। अगर आपको कोई भी वित्तीय सलाहकार इस रणनीति के साथ निवेश की सलाह देता है तो आपको सचेत हो जाना चाहिए। टाइमिंग द मार्केट में कई बार आपको बहुत ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है। अगर आप ब्रोकर की मदद ले रहे हैं तो बार-बार ट्रेडिंग करने से ब्रोकरेज कमीशन की लागत बढ़ जाती है। जितना अधिक स्टॉक खरीदा और बेचा जाता है, उतना ही ज्यादा कमीशन ब्रोकर कमाता है। इसमें सबसे बुरी बात यह है कि इस कमीशन का भुगतान निवेशक को ही करना होता है, भले ही उसे बाजार में नुकसान उठाना पड़ रहा हो। इसलिए इस विधि के लिए पहले सीखिए और अपनी सिखलाई का अधिक से अधिक प्रयोग कीजिए। जब तक अपने इन्वेस्टमेंट आइडियालॉजी के मानकों पर खरा न हो, सौदा कत्तई नहीं करना है। एक और चीज इंट्रा डे, फ्यूचर और ऑप्शन से दूर रहना है। 

*टाइमिंग इन मार्केट*
टाइम इन द मार्केट, टाइमिंग द मार्केट से बिल्कुल अलग है क्योंकि इस रणनीति में छोटी अवधि के लिए भविष्यवाणी नहीं किए जाते। यहां निवेशक यह अनुमान लगाने की कोशिश नहीं करेगा कि बाजार अपने सबसे निचले स्तर पर है या उच्चतम स्तर पर। इसमें निवेशक को स्टॉक खरीदते समय यह पता होता है कि हो सकता है उसकी टाइमिंग सही ना हो, लेकिन लंबी अवधि में वह स्टॉक ज्यादा रिटर्न दे सकती है। अगर स्टॉक फंडामेंटली स्ट्रांग है और उसमें लंबी अवधि में ज्यादा रिटर्न देने की संभावनाएं हैं, तो ऐसे में शॉर्ट टर्म में उस स्टॉक की कीमत में होने वाला उतार-चढ़ाव से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता।
यह रणनीति साबित करती है कि बाजार को समय देना और धैर्य बनाकर रखना, छोटी अवधि के निवेश से ज्यादा फायदेमंद है। जब कोई किसी शेयर को 10 साल के लिए अपने पास रखता है, तो चक्रवृद्धि और इनवेस्टमेंट ग्रोथ के सकारात्मक प्रभाव से बढ़िया रिटर्न मिलता है। धैर्य के साथ निवेश करने वाले निवेशकों को रिटर्न ज्यादा मिलता है। लंबी अवधि में ज्यादा रिटर्न जनरेट करने के लिए बाजार में समय बिताना जरूरी होता है  ऐसा करने से, निवेशक नेचुरल मार्केट साइकिल पर काबू पा लेता है। कुछ लोगों को बाजार में ज्यादा समय बिताना मुश्किल लग सकता है, लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए लंबी अवधि में उनका फाइनेंशियल गोल क्या है। समय के साथ स्थिर ग्रोथ के लिए इंतजार करके, स्मार्ट निवेशक अपनी लंबी अवधि के वित्तीय लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं। 

कौन सी विधि बेहतर है
दोनों विधि सही है लेकिन पहली विधि उनके लिए है जो रोज मार्केट के लिए रिसर्च के लिए कुछ न कुछ समय निकालते है, यह रोमांचक भी होता है क्योंकि रोज कुछ न कुछ करने को होता है। यदि आप रोज 2 घंटे या सप्ताह में 8/10 घंटे रिसर्च के लिए निकाल सकते है तो यह विधि सही है। इस विधि में तकनीकी विश्लेषक का गुण होता ज्यादा फायदेमंद होता है। वहीं दूसरी तरफ दूसरी विधि थोड़ी सी बोरिंग होती है इसमें पैसे डालकर चुपचाप धैर्य से बैठना होता है और समय अपने आप रिवार्ड देता है। मेरा तो मानना है कि जो मार्केट के लिए टाइम नहीं निकाल सकता चुपचाप कुछ पसंदीदा बिजनेस को चिन्हित करे और पैसा लगाते रहे तो बड़ा वेल्थ क्रिएट कर सकता है। 

लेख कैसा लगा जरूर बताएं। कुछ जानकारी के लिए 7272957000 पर कॉन्टैक्ट कर सकते हैं।

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2022

कुछ वित्तीय नियम


     अपने यहां बहुत सारी पढ़ाईयां होती है लेकिन अर्थ वित्त को लेकर नहीं होती है। आदमी पूरा जीवन जीविकोपार्जन के लिए पैसा कमाने में व्यस्त रहता है, लेकिन उसके लिए कहीं नहीं पढ़ाया जाता है जिसके वजह से बहुसंख्यक लोग मैनेज नहीं कर पाते है, या फिर किसी गलत व्यक्ति के चक्कर में पड़कर नुकसान उठाते है। हम भले ही अर्थशास्त्र और फाइनेंस की पढ़ाई कर ले लेकिन असली जरूरत की चीजे उसमें नदारद होती है। मेरे विचार से व्यावहारिक वित्तीय शिक्षा पढ़ाई का एक अनिवार्य हिस्सा होनी चाहिए। हम लोगों को जो अनुभव और माता पिता की सीख सिखाती है वो पढ़ाई वाली पुस्तकें नहीं। पढ़ाई के बाहर कुछ पुस्तके है जिसे हमें हर हाल में पढ़नी चाहिए और अपने बच्चों को भी पढ़ानी चाहिए। मैंने जो चिन्हित किया है वो पुस्तकें है
1) बेबीलोन का सबसे अमीर आदमी
2) रिच डैड पूअर डैड
3) द सीक्रेट ऑफ मिलेनेयर माइंड
4) साइकोलॉजी ऑफ मनी
ये पुस्तके आपको वो ज्ञान देगी जो हम अपने वर्षों के अनुभव से सीखते है, कहने का आशय यह है कि ये हमें दूसरों की तुलना में नहीं नहीं तो भी 10 साल आगे कर देती है। 
 सौरव जी ने पहली पुस्तक की सिखलाई को पढ़कर सारांश लिखा जिसे नीचे अपनी पोस्ट के अनुसार एडिट करके दे रहा हूं। लेखक कुछ काम करने को कहता है जो इस प्रकार है

1) अपने पर्स को मोटा करना शुरू करें जिसमें लेखक कहता है कि अपने पर्स में रखे 10 सिक्के में से 9 खर्च कीजिए तो जो बचत होगी उससे पर्स मोटा होने लगेगा। जो अपनी आमदनी का एक निश्चित हिस्सा बचाता है उसके पास धन और आता है, धन खाली पर्स वाले पर मेहरबान नहीं होता। पर्स से जो पैसे निकालते है उससे वर्तमान की इच्छाएं पूर्ण होती है जबकि जो बचाते है उससे दीर्घकालिक की। 

2) ख़र्च को नियंत्रित करें
        जरुरी ख़र्च और अपनी इच्छाओं के बीच के फ़र्क़ को नज़रअंदाज़ न करें। आपकी आमदनी से आपकी जितनी इच्छाएँ संतुष्ट हो सकती हैं, आपकी और आपके परिवार की इच्छाएँ उससे कहीं ज़्यादा होती हैं। इसलिए आप जिन चीज़ों के लिए ख़र्च करना चाहते हों, उन्हें लिख लें। सिर्फ़ आवश्यक चीज़ों को चुनें। इसके अलावा सिर्फ़ उन्हीं चीज़ों को चुनें, जो आपकी 90% आमदनी में संभव हों। बाक़ी सब चीज़ों को हटा दें और उन्हें अपनी असीमित इच्छाओं का हिस्सा मान लें, जो संतुष्ट नहीं होंगी। उनका अफ़सोस न करें।

3) अपने धन को कई गुना बढ़ाएँ
        अब हमें यह सोचना है कि उस पैसे को कैसे काम पर लगाए ताकि वो और पैसा लेकर आए। क्योंकि पैसे को सिर्फ रखे रहने पर महंगाई यानी मुद्रा स्फीति उसकी दिन प्रति दिन वैल्यू कम करती जाती है। ध्यान देना है कि दौलत सिर्फ पर्स में खनखना रहे सिक्‍कों से नहीं बनती है। असली दौलत तो निवेश से प्राप्त आमदनी से बनती है। दौलत का अर्थ धन की वह धारा है, जो लगातार पर्स में बहकर आती है ओर उसे हमेशा मोटा करती रहती है।

4) अपनी पूंजी की रक्षा करें
 इंसान को अपने पर्स में रखे धन की दृढ़ता से रक्षा करनी चाहिए। अगर वह ऐसा नहीं करेगा, तो धन उसके पास से चला जाएगा। निवेश का पहला सिद्धांत है आपके मूलधन की सुरक्षा। अगर मूलधन के चले जाने का ख़तरा हो, तो क्या ज़्यादा कमाई के लालच में पड़ना समझदारी है?  इसमें ज़रा भी समझदारी नज़र नहीं आती है। अगर आप इतना बड़ा जोखिम उठाते हैं, तो इसकी सज़ा यह होगी कि शायद आप अपना मूलधन भी गँवा दें।  अपनी जमापूँजी का निवेश करने से पहले सावधानी से जाँच-पड़ताल करें। पहले पूरी तरह आश्वस्त हो जाएँ कि आपकी पूँजी सुरक्षित लौट आएगी। बेहतर यह है कि आप धन के प्रबंधन में अनुभवी लोगों की समझदारी भरी सलाह लें। इस तरह की सलाह माँगने पर मुफ़्त मिल जाती है। हो सकता है यह सलाह उतनी ही मूल्यवान साबित हो, जितनी रक़म का आप निवेश करने जा रहे हैं। सच तो यह है कि अगर यह सलाह आपकी पूँजी को डूबने से बचाती है, तो यह आपकी पूँजी जितनी ही मूल्यवान होती है।

5) अपने घर को लाभकारी निवेश बनाएँ
        किसी भी व्यक्ति का परिवार तब तक ज़िंदगी का पूरा आनंद नहीं ले सकता, जब तक कि उसके मकान में इतनी जगह न हो कि उसके बच्चे साफ़-सुथरी धरती पर खेल सकें और उसकी पत्नी न सिर्फ़ सुंदर फूल उगा सके, बल्कि परिवार को खिलाने के लिए अच्छी सब्ज़ियाँ भी उगा सके।
अपने घर का स्वामी बनने में हमें गर्व का एहसास होता है। इससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है और हम अपने सभी प्रयासों में ज़्यादा मेहनत करते है। इसलिए हर आदमी के पास अपना ख़ुद का मकान होना चाहिए, जिसमें वह और उसका परिवार रह सके।

6) भविष्य में आमदनी होती रहे, ये सुनिश्चित करना है
        हर व्यक्ति की ज़िंदगी बचपन से बुढ़ापे की तरफ़ चलती है। यह ज़िंदगी का मार्ग है और इस पर हर एक को चलना पड़ता है, जब तक कि देवता उसे असमय ही अपने पास न बुला लें। इसलिए इंसान को अपने भविष्य या बुढ़ापे के लिए उचित आमदनी की व्यवस्था कर लेना चाहिए। इसके अलावा उसे इस बात की भी व्यवस्था कर लेना चाहिए कि अगर वह इस दुनिया में न रहे, तो भी उसके परिवार को सहारा तथा आराम मिलता रहे।

7) अपनी आमदनी की क्षमता बढ़ाएँ
        पैसा हमारी योग्यता का प्रतिफल होता है। यदि जानें 10 हजार रुपया मिल रहा है तो ये स्वीकार करना है कि हमारी योग्यता ही 10 हजार की है। कमाई कभी भी हमारी योग्यता को लांघती नहीं है। इसलिए सबसे पहले हमें अपनी योग्यता पर काम करना है। जितना ज्ञान लेते है, योग्यता उतनी बेहतर होती है। जब मनुष्य अपने काम में ज़्यादा कुशल बनता है, तो वह अपनी कमाने की क्षमता को भी बढ़ा लेता है। हमारे पास जितना ज्ञान होता है, हम उतना ही ज़्यादा कमा सकते हैं। जो व्यक्ति अपनी कला में ज़्यादा निपुणता हासिल करने की कोशिश करता है, उसे उसके अच्छे पुरस्कार मिलते हैं* |