SMART INVESTING क्या है
बाजार में निवेश करते समय निवेशकों की सबसे बड़ी चिंता ज्यादा रिटर्न का पीछा करने में शामिल जोखिमों को लेकर होती है। मार्केट में शॉर्ट टर्म में जोखिम एक बहुत बड़ा इश्यू होता है जबकि लॉन्ग टर्म यानी 5 साल से अधिक का नजरिया जोखिम कम हो जाता है। बिजनेस जितना ही अच्छा होता है, समय उतना ही बड़ा रिवार्ड देता है। स्मार्ट इनवेस्टर अच्छी तरह जानते हैं कि बाजार को लेकर किसी भी तरह की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती इसलिए वो लोग अपने प्रॉसेस पर ध्यान देते है। इस संबंध में वारेन बफेट का एक कथन काफी लोकप्रिय है कि मार्केट के बारे में एक भविष्यवाणी हो सकती है कि इसके बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं हो सकती। हमें मार्केट की दिशा की भविष्यवाणी या चिंता के बारे में सोचने के बजाय अपने निवेश स्ट्रेटजी पर ध्यान देना है। वैसे भी मार्केट को लॉन्ग टर्म में अंततः बढ़ना ही है। इसलिए ध्यान स्टॉक चुनने और उसमें निवेश के अनुशासन पर होनी चाहिए। ये जितनी अच्छी होगी उतना ही अच्छा लाभ भी मिलेगा। छोटी अवधि में मार्केट में उतार चढ़ाव होना इसका कुल स्वभाव है जिसके कारण किसी भी निवेश पर फायदा या नुकसान हो सकता है लेकिन ज्यादा रिटर्न की चाहने वाले निवेशक लंबी अवधि तक निवेश करना पसंद करते हैं। लेकिन ध्यान यहां यह देना है कि समय अच्छे बिजनेस का मित्र होता है जबकि खराब बिजनेस का शत्रु। यानी बिजनेस अच्छा होगा तो लॉन्ग टर्म नोट छापने की मशीन की तरह से होगा जबकि खराब बिजनेस वेल्थ डिस्ट्रॉय कर देता है।
अक्सर बाजार में टाइम इन द मार्केट और टाइमिंग द मार्केट को लेकर बहस होती रहती है। कई निवेशक निवेश करते समय किसी स्टॉक के भविष्य के बाजार मूल्य का अनुमान लगाने की कोशिश करते हैं। इसमें जोखिम काफी ज्यादा होता है लेकिन यदि टेकनिकल एनालसिस सीख लिया जाय तो जोखिम को कम किया जा सकता है। टेक्निकल एनल्सिस के बहुत सारे टूल होते है लेकिन कम जानिए और उसका ज्यादा प्रयोग ज्यादा फायदेमंद होता है। शेयरों के भाव को भविष्य का अनुमान लगाकर निवेश करने की इस रणनीति को ही "टाइमिंग द मार्केट" कहते हैं. इसके उलट, कई निवेशक लंबी अवधि के लिए निवेश करते हैं। ऐसे निवेशक यह अनुमान लगाने की कोशिश किए बिना स्टॉक खरीदते हैं कि बाजार में कब तेजी या मंदी होगी। निवेश की इस रणनीति को टाइम इन द मार्केट कहा जाता है।
अब सवाल यह है कि दोनों में बेहतर रणनीति क्या है ?
*टाइमिंग द मार्केट*
टाइमिंग द मार्केट का मतलब यह है कि एक निवेशक स्टॉक के भविष्य के शेयर की कीमत का अनुमान लगाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि यह तरीका सोचने में अच्छा लगता है कि कम कीमत पर खरीदो और कीमत ज्यादा होने पर बेच दो और यदि पूर्व के चार्ट देखिए तो यह बड़ा आसान लगता है लेकिन इस तरीके में जोखिम काफी ज्यादा होता है क्योंकि स्टॉक के वर्तमान भाव से अनुमान लगाना मुश्किल होता है कि यहां से वो बढ़ेगा या और घटेगा। इस पूरी प्रॉसेस में अपनी निवेश रणनीति के प्रति अनुशासन बहुत मायने रखता है। प्रायः देखने में आता है कि इस विधि में ज्यादातर लोग भाग्य भरोसे खेल खेलते है, ज्यादातर लोग स्टॉक इसलिए खरीदते है क्योंकि वो गिर चुका होता है। इस तरीके से हो सकता है कि हमारी ‘किस्मत’ अच्छी हो और ज्यादा रिटर्न मिल जाए। ऐसा भी हो सकता है कि किस्मत अच्छी ना हो और काफी ज्यादा नुकसान हो जाए। ये पूर्णतया सत्य है कि स्टॉक मार्केट में भविष्य के बारे में किसी भी तरह का अनुमान नहीं लगाया जा सकता, हमें सिर्फ अपने आइडियोलॉजी पर ध्यान देना है। स्टॉक की कीमतें तेजी के साथ बदलती हैं, इसका मतलब यह है कि आपका अनुमान हमेशा सटीक नहीं हो सकता। अगर आपको कोई भी वित्तीय सलाहकार इस रणनीति के साथ निवेश की सलाह देता है तो आपको सचेत हो जाना चाहिए। टाइमिंग द मार्केट में कई बार आपको बहुत ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है। अगर आप ब्रोकर की मदद ले रहे हैं तो बार-बार ट्रेडिंग करने से ब्रोकरेज कमीशन की लागत बढ़ जाती है। जितना अधिक स्टॉक खरीदा और बेचा जाता है, उतना ही ज्यादा कमीशन ब्रोकर कमाता है। इसमें सबसे बुरी बात यह है कि इस कमीशन का भुगतान निवेशक को ही करना होता है, भले ही उसे बाजार में नुकसान उठाना पड़ रहा हो। इसलिए इस विधि के लिए पहले सीखिए और अपनी सिखलाई का अधिक से अधिक प्रयोग कीजिए। जब तक अपने इन्वेस्टमेंट आइडियालॉजी के मानकों पर खरा न हो, सौदा कत्तई नहीं करना है। एक और चीज इंट्रा डे, फ्यूचर और ऑप्शन से दूर रहना है।
*टाइमिंग इन मार्केट*
टाइम इन द मार्केट, टाइमिंग द मार्केट से बिल्कुल अलग है क्योंकि इस रणनीति में छोटी अवधि के लिए भविष्यवाणी नहीं किए जाते। यहां निवेशक यह अनुमान लगाने की कोशिश नहीं करेगा कि बाजार अपने सबसे निचले स्तर पर है या उच्चतम स्तर पर। इसमें निवेशक को स्टॉक खरीदते समय यह पता होता है कि हो सकता है उसकी टाइमिंग सही ना हो, लेकिन लंबी अवधि में वह स्टॉक ज्यादा रिटर्न दे सकती है। अगर स्टॉक फंडामेंटली स्ट्रांग है और उसमें लंबी अवधि में ज्यादा रिटर्न देने की संभावनाएं हैं, तो ऐसे में शॉर्ट टर्म में उस स्टॉक की कीमत में होने वाला उतार-चढ़ाव से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता।
यह रणनीति साबित करती है कि बाजार को समय देना और धैर्य बनाकर रखना, छोटी अवधि के निवेश से ज्यादा फायदेमंद है। जब कोई किसी शेयर को 10 साल के लिए अपने पास रखता है, तो चक्रवृद्धि और इनवेस्टमेंट ग्रोथ के सकारात्मक प्रभाव से बढ़िया रिटर्न मिलता है। धैर्य के साथ निवेश करने वाले निवेशकों को रिटर्न ज्यादा मिलता है। लंबी अवधि में ज्यादा रिटर्न जनरेट करने के लिए बाजार में समय बिताना जरूरी होता है ऐसा करने से, निवेशक नेचुरल मार्केट साइकिल पर काबू पा लेता है। कुछ लोगों को बाजार में ज्यादा समय बिताना मुश्किल लग सकता है, लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए लंबी अवधि में उनका फाइनेंशियल गोल क्या है। समय के साथ स्थिर ग्रोथ के लिए इंतजार करके, स्मार्ट निवेशक अपनी लंबी अवधि के वित्तीय लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं।
कौन सी विधि बेहतर है
दोनों विधि सही है लेकिन पहली विधि उनके लिए है जो रोज मार्केट के लिए रिसर्च के लिए कुछ न कुछ समय निकालते है, यह रोमांचक भी होता है क्योंकि रोज कुछ न कुछ करने को होता है। यदि आप रोज 2 घंटे या सप्ताह में 8/10 घंटे रिसर्च के लिए निकाल सकते है तो यह विधि सही है। इस विधि में तकनीकी विश्लेषक का गुण होता ज्यादा फायदेमंद होता है। वहीं दूसरी तरफ दूसरी विधि थोड़ी सी बोरिंग होती है इसमें पैसे डालकर चुपचाप धैर्य से बैठना होता है और समय अपने आप रिवार्ड देता है। मेरा तो मानना है कि जो मार्केट के लिए टाइम नहीं निकाल सकता चुपचाप कुछ पसंदीदा बिजनेस को चिन्हित करे और पैसा लगाते रहे तो बड़ा वेल्थ क्रिएट कर सकता है।
लेख कैसा लगा जरूर बताएं। कुछ जानकारी के लिए 7272957000 पर कॉन्टैक्ट कर सकते हैं।
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