वाहन बीमा के रूप में थोड़े पैसे में बड़ी समस्याओं के समाधान को खरीदना
हमें यदि अपने नुकसान की चिंता नहीं हैं तो कोई बात नहीं, कम से कम हमें उनकी तो चिंता करनी ही चाहिए जिनका हमारे वजह से कोई नुकसान हो सकता है। समाचार पत्रों में आए दिन ऑडी प्रकाशित खबरें मिल जाती है जिसमें एक्सीडेंट के दौरान गाड़ी का बीमा एक्सपायर्ड हो चुका होता है। अपने देश में ज्यादातर लोग गाड़ी का बीमा और हेलमेट की सुविधा सुरक्षा की दृष्टि से नहीं बल्कि पुलिस चेकिंग से बचने के लिए लेते है। राजनेता है तो उन्हे पुलिस चेकिंग का भय तो है नहीं, फिर काहें का बीमा।
बहरहाल इसी से मिलता जुलता वर्षों पहले का एक प्रकरण याद आ गया। एक हमारे जानने वाले है, वो फेसबुक पर भी जुड़े हुए है, हालांकि यह घटना शेयर करने से पहर उनकी अनुमति भी नहीं लिया हूं। मित्र का ट्रक चलता था जो एक दिन झारखंड में इनके ट्रक की किसी और ट्रक से आमने सामने की टक्कर हो गई जिसमें एक की मृत्यु हो गई। उनकी बड़ी मुश्किल क्योंकि बीमा था ही नहीं। संकट काल में मुझे फोन किए कि किया क्या जाय। मेरा उनको एक ही राय था, इस पूरे मसले को कानून के दायरे से बाहर ही आपस में बैठ कर समझ लीजिए, फायदे में रहेंगे। उन्होंने औरों से भी राय लिए शायद सभी ने उन्हे यही सलाह दिया और दोनो पक्षों ने अन ऑफिसियल मामले को बाहर ही समझ लिए। इस पूरे समस्या में उनका अच्छा खासा कई लाख रु खर्च हुआ लेकिन सुकून की यह बात थी कि निबट गया वर्ना कानून के झमेले में आए होते तो लंबा झेलते। उन्हे अपने वाहन के मरम्मत में भी खर्च करने पड़े। यदि बीमा को कुछ हजार प्रीमियम वो समय से दे दिए होते तो उन्हे लाखों का नुकसान नहीं होता। और आज उनके ट्रक भी चल रहे होते।
हम मानव है, हम लोग स्वभाव से नजदीक के फायदे और नुकसान को ज्यादा तवज्जो देते है। हमें ऐसा नहीं करना चाहिए, हमेशा दूरगामी सोच रखनी चाहिए। बहुत सारे लोग टर्म प्लान भी नहीं लेते, तर्क होता है उसका क्या फायदा जो मरने के बाद मिले। हम थोड़े से प्रीमियम से बड़ी समस्याओं का समाधान खरीदते है।
किसी भी वाहन बीमा में मुख्य रूप से 3 चीजे जुड़ी रहती है
1) ड्राइवर का बीमा
2) गाड़ी की टूट फुट या चोरी होने में सुरक्षा और
3) थर्ड पार्टी सुरक्षा
अब हम इस पर विस्तार से बाते करते है। वाहन बीमा में जो पहली चीज होती है वो ड्राइवर की सुरक्षा। यदि गाड़ी का बीमा होता है और दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो जाती है तो ड्राइवर के परिवार को रू 15 लाख (जहां तक मेरी जानकारी है) मिलता है। बीमा के अभाव में ये नहीं मिलता इसलिए प्रत्येक वाहन स्वामी का दायित्व कि इसे कराए और यदि कोई ड्राइवर को नौकरी पर रखे है तो उसके परिवार की सुरक्षा बढ़ जाती हैं। यदि वाहन बीमा कराते समय एक ऑप्शन और टिक कर दें तो ड्राइवर ही नहीं बाकी सभी सवारियों के जीवन का भी बीमा हो जाता है और बहुत थोड़े से प्रीमियम का ही अंतर आता है।
दूसरी गाड़ी में टूट फुट होने पर इंश्योरेंस कंपनी द्वारा मरम्मत का एक बड़ा हिस्सा वहन किया जाता है। या गाड़ी चोरी हो जाती है तो गाड़ी की जो वैल्यू होती है, उतना पैसा बीमा कम्पनी द्वारा वाहन स्वामी को मिलता है, ताकि वो उस पैसे से दूसरा वाहन खरीद सके। ये वाला जो फीचर है न ये व्यक्तिगत लाभ और हानि से जुड़ा हुआ है, इसे हम न भी कराए तो भी चल जाएगा।
अब हम तीसरे प्वाइंट पर आते है जो सभी में सबसे अधिक इंपॉर्टेंट है। होता क्या है कि हमारे गलतियों से किसी की मृत्यु हो जाती है तो उसके जीवन वैल्यू के बराबर पैसा देना होता है जिस बीमा कंपनी द्वारा वहन किया जाता है। जीवन वैल्यू मतलब आने वाले समयों में वह कितना पैसा कमा सकता है, यानी यह बहुत बड़ी रकम होती है, जिसे व्यक्तिगत तौर पर भुगतान पॉसिबल नहीं होता।
इस तरह हमारा नैतिक दायित्व है कि कम से कम थर्ड पार्टी इंश्योरेंस तो कराए ही कराए। इसका प्रीमियम भी कम आता है।
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