अपने यहां बहुत सारी पढ़ाईयां होती है लेकिन अर्थ वित्त को लेकर नहीं होती है। आदमी पूरा जीवन जीविकोपार्जन के लिए पैसा कमाने में व्यस्त रहता है, लेकिन उसके लिए कहीं नहीं पढ़ाया जाता है जिसके वजह से बहुसंख्यक लोग मैनेज नहीं कर पाते है, या फिर किसी गलत व्यक्ति के चक्कर में पड़कर नुकसान उठाते है। हम भले ही अर्थशास्त्र और फाइनेंस की पढ़ाई कर ले लेकिन असली जरूरत की चीजे उसमें नदारद होती है। मेरे विचार से व्यावहारिक वित्तीय शिक्षा पढ़ाई का एक अनिवार्य हिस्सा होनी चाहिए। हम लोगों को जो अनुभव और माता पिता की सीख सिखाती है वो पढ़ाई वाली पुस्तकें नहीं। पढ़ाई के बाहर कुछ पुस्तके है जिसे हमें हर हाल में पढ़नी चाहिए और अपने बच्चों को भी पढ़ानी चाहिए। मैंने जो चिन्हित किया है वो पुस्तकें है
1) बेबीलोन का सबसे अमीर आदमी
2) रिच डैड पूअर डैड
3) द सीक्रेट ऑफ मिलेनेयर माइंड
4) साइकोलॉजी ऑफ मनी
ये पुस्तके आपको वो ज्ञान देगी जो हम अपने वर्षों के अनुभव से सीखते है, कहने का आशय यह है कि ये हमें दूसरों की तुलना में नहीं नहीं तो भी 10 साल आगे कर देती है।
सौरव जी ने पहली पुस्तक की सिखलाई को पढ़कर सारांश लिखा जिसे नीचे अपनी पोस्ट के अनुसार एडिट करके दे रहा हूं। लेखक कुछ काम करने को कहता है जो इस प्रकार है
1) अपने पर्स को मोटा करना शुरू करें जिसमें लेखक कहता है कि अपने पर्स में रखे 10 सिक्के में से 9 खर्च कीजिए तो जो बचत होगी उससे पर्स मोटा होने लगेगा। जो अपनी आमदनी का एक निश्चित हिस्सा बचाता है उसके पास धन और आता है, धन खाली पर्स वाले पर मेहरबान नहीं होता। पर्स से जो पैसे निकालते है उससे वर्तमान की इच्छाएं पूर्ण होती है जबकि जो बचाते है उससे दीर्घकालिक की।
2) ख़र्च को नियंत्रित करें
जरुरी ख़र्च और अपनी इच्छाओं के बीच के फ़र्क़ को नज़रअंदाज़ न करें। आपकी आमदनी से आपकी जितनी इच्छाएँ संतुष्ट हो सकती हैं, आपकी और आपके परिवार की इच्छाएँ उससे कहीं ज़्यादा होती हैं। इसलिए आप जिन चीज़ों के लिए ख़र्च करना चाहते हों, उन्हें लिख लें। सिर्फ़ आवश्यक चीज़ों को चुनें। इसके अलावा सिर्फ़ उन्हीं चीज़ों को चुनें, जो आपकी 90% आमदनी में संभव हों। बाक़ी सब चीज़ों को हटा दें और उन्हें अपनी असीमित इच्छाओं का हिस्सा मान लें, जो संतुष्ट नहीं होंगी। उनका अफ़सोस न करें।
3) अपने धन को कई गुना बढ़ाएँ
अब हमें यह सोचना है कि उस पैसे को कैसे काम पर लगाए ताकि वो और पैसा लेकर आए। क्योंकि पैसे को सिर्फ रखे रहने पर महंगाई यानी मुद्रा स्फीति उसकी दिन प्रति दिन वैल्यू कम करती जाती है। ध्यान देना है कि दौलत सिर्फ पर्स में खनखना रहे सिक्कों से नहीं बनती है। असली दौलत तो निवेश से प्राप्त आमदनी से बनती है। दौलत का अर्थ धन की वह धारा है, जो लगातार पर्स में बहकर आती है ओर उसे हमेशा मोटा करती रहती है।
4) अपनी पूंजी की रक्षा करें
इंसान को अपने पर्स में रखे धन की दृढ़ता से रक्षा करनी चाहिए। अगर वह ऐसा नहीं करेगा, तो धन उसके पास से चला जाएगा। निवेश का पहला सिद्धांत है आपके मूलधन की सुरक्षा। अगर मूलधन के चले जाने का ख़तरा हो, तो क्या ज़्यादा कमाई के लालच में पड़ना समझदारी है? इसमें ज़रा भी समझदारी नज़र नहीं आती है। अगर आप इतना बड़ा जोखिम उठाते हैं, तो इसकी सज़ा यह होगी कि शायद आप अपना मूलधन भी गँवा दें। अपनी जमापूँजी का निवेश करने से पहले सावधानी से जाँच-पड़ताल करें। पहले पूरी तरह आश्वस्त हो जाएँ कि आपकी पूँजी सुरक्षित लौट आएगी। बेहतर यह है कि आप धन के प्रबंधन में अनुभवी लोगों की समझदारी भरी सलाह लें। इस तरह की सलाह माँगने पर मुफ़्त मिल जाती है। हो सकता है यह सलाह उतनी ही मूल्यवान साबित हो, जितनी रक़म का आप निवेश करने जा रहे हैं। सच तो यह है कि अगर यह सलाह आपकी पूँजी को डूबने से बचाती है, तो यह आपकी पूँजी जितनी ही मूल्यवान होती है।
5) अपने घर को लाभकारी निवेश बनाएँ
किसी भी व्यक्ति का परिवार तब तक ज़िंदगी का पूरा आनंद नहीं ले सकता, जब तक कि उसके मकान में इतनी जगह न हो कि उसके बच्चे साफ़-सुथरी धरती पर खेल सकें और उसकी पत्नी न सिर्फ़ सुंदर फूल उगा सके, बल्कि परिवार को खिलाने के लिए अच्छी सब्ज़ियाँ भी उगा सके।
अपने घर का स्वामी बनने में हमें गर्व का एहसास होता है। इससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है और हम अपने सभी प्रयासों में ज़्यादा मेहनत करते है। इसलिए हर आदमी के पास अपना ख़ुद का मकान होना चाहिए, जिसमें वह और उसका परिवार रह सके।
6) भविष्य में आमदनी होती रहे, ये सुनिश्चित करना है
हर व्यक्ति की ज़िंदगी बचपन से बुढ़ापे की तरफ़ चलती है। यह ज़िंदगी का मार्ग है और इस पर हर एक को चलना पड़ता है, जब तक कि देवता उसे असमय ही अपने पास न बुला लें। इसलिए इंसान को अपने भविष्य या बुढ़ापे के लिए उचित आमदनी की व्यवस्था कर लेना चाहिए। इसके अलावा उसे इस बात की भी व्यवस्था कर लेना चाहिए कि अगर वह इस दुनिया में न रहे, तो भी उसके परिवार को सहारा तथा आराम मिलता रहे।
7) अपनी आमदनी की क्षमता बढ़ाएँ
पैसा हमारी योग्यता का प्रतिफल होता है। यदि जानें 10 हजार रुपया मिल रहा है तो ये स्वीकार करना है कि हमारी योग्यता ही 10 हजार की है। कमाई कभी भी हमारी योग्यता को लांघती नहीं है। इसलिए सबसे पहले हमें अपनी योग्यता पर काम करना है। जितना ज्ञान लेते है, योग्यता उतनी बेहतर होती है। जब मनुष्य अपने काम में ज़्यादा कुशल बनता है, तो वह अपनी कमाने की क्षमता को भी बढ़ा लेता है। हमारे पास जितना ज्ञान होता है, हम उतना ही ज़्यादा कमा सकते हैं। जो व्यक्ति अपनी कला में ज़्यादा निपुणता हासिल करने की कोशिश करता है, उसे उसके अच्छे पुरस्कार मिलते हैं* |
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