शनिवार, 1 मई 2021

लापरवाही ने कोरोना को बढ़ाया

साल भर पहले कोरोना महामारी की क्या स्थिति थी, उन दिनों के समाचारों का अवलोकन कीजिए तो पता चल जाएगा। चूंकि हम अपने फेसबुक टाइम लाइन पर इस तरह की खबरों को पोस्ट करते रहते हैं, तो अक्सर करके सामने आ ही जाती है। पिछले वर्ष आज ही की तारीख यानी 1 मई 2020 की एक पेपर कटिंग को देखते है

    पिछले वर्ष यूरोप और अमेरिका की ऐसी स्थिति थी कि 3 में एक मरीज वापस नहीं आता था, यह तब की दशा थी जबकि वो स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में शीर्ष पर आते थे, हम लोग तो उसके सामने कही नहीं टिकते है। पिछले साल जब अपने देश में इस महामारी ने कोई खास नुकसान नहीं पहुंचाया तो हम लोग स्वीकार कर लिए थे कि हमने इस माहामारी पर विजय श्री प्राप्त कर लिया है। हमारा खान पान, रहन सहन इतना मजबूत है कि कुछ नही होगा, होगा भी तो सर्दी, खांसी और बुखार तक सीमित रहेगा। इसी विश्वास पर लोगों ने टीका लगाने का भी विरोध किया, बकायदा लोगों ने सोशल मीडिया में अपने विचार रखे कि सरकार को टीकाकरण पर पैसा खर्च करने की क्या जरूरत, टिका लगाने के लिए लोगों के साथ जबरदस्ती कितना उचित है। टिके के साइड इफेक्ट की कहानियां तक गढ़ी गई, किसी पार्टी विशेष का बताया गया और पता नहीं क्या क्या नहीं किया गया।  वो सभी चीजे हम लोगों के आस पास ही है। मेरा विभाग ऐसा है जहां टीकाकरण के शुरुआती दौर में ही लगवाने थे, टिका लगवाकर प्रमाणपत्र तक देना था। ऐसे में बहुत से लोगों ने महामारी से बचाव के लिए नहीं अपितु इसलिए कि वेतन न कटे। बहरहाल हम लोगों की लापरवाही ने यूरोंप वाली स्थिति अपने देश में ला दी। नया वर्ष, होली, रमजान, कुंभ, पंचायत चुनाव, विधान सभा चुनाव, किसान आंदोलन को लेकर हुई महापंचायतें ने इस महामारी के फैलने में खाद पानी का काम किया। सरकारों ने भी इसके लिए कोई तैयारी नहीं किया। वर्तमान स्थिति इतनी खराब हो गई है कि मार्केट में ऑक्सीजन और दवाओं को लेकर काला बाजारी चरम पर है, लोग भय से ग्रस्त है। प्रत्येक व्यक्ति के आस पास कई मौते हो चुकी है। बहुत से लोग अभी भी सचेत नहीं है, मार्केट में 10/20 प्रतिशत लोग बगैर मास्क के दिख ही जाते है।

   जैसे जैसे एक एक दिन निकलते है ईश्वर को विशेष धन्यवाद देते है कि हम सुरक्षित है, लेकिन कब तक ? दिन प्रति दिन करीब आती जा रही है। अपना काम है सरकार के आवश्यक दिशा निर्देशों का पालन करते हुए अपने से जो भी उचित हो सकता है, एहतियात करना। यह रोग भयंकर छुआछूत का है। इस रोग से बचाव के लिए जितना ही कम से कम लोगों के संपर्क में आए, उतना ही सही रहता है।

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