क्या आपको पता है कि गूंगे लोगों की समस्या क्या होती है ? यदि नहीं तो जान लीजिये कि कोई जन्म से गूंगा नहीं पैदा होता है. वो गूंगा इसलिए होता है क्योंकि वो बहरा होता है. चुकी वो सुन नहीं पाता है इसलिए वो बोल नहीं पाता है. बोलने से अधिक जरुरी है सुनना, जब हम सुनेगे तभी बोल पायेंगे. हमे ईश्वर ने एक मुह और दो कान इसलिए दिया है कि हम बोले कम और सुने ज्यादा. लेकिन क्या हम लोग ऐसा करते है क्या ? हम तो अपनी सुनाने के चक्कर मे दूसरे को बोलने नहीं देते। केवल अपनी बात कहने वाला व्यक्ति समाज में कभी भी उचित मान सम्मान नहीं पा पाता है. लोग उनसे कन्नी भी काटते है. छवि भी नकारात्मक हो जाती है. ऐसा होता क्यूँ है ? वो इसलिए होता है क्योंकि सुनने कि कला सबके अंदर नहीं होती है . इस कला को विकसित करके ज्यादा सम्मान पा सकते है, अच्छे वक्ता हो सकते है, जब हम सुनेंगे अधिक तो जब भी बोलेंगे तो तथ्यात्मक बोलेंगे, उसमे वजन होगा और लोग उन बातों को मानेगें भी.
अच्छा श्रोता बनना बहुत जरुरी है. इसे एक दिन में विकसित नहीं कर सकते लेकिन यदि प्रयास किये जाए तो एक दिन अवश्य बन सकते है. इसकी शुरुआत सकारातमक होने से करनी चाहिए. सकारात्मक होने से धैर्य, शांत, संयमी हो जाते है, सामने वाले में अच्छी चीज खोजने का प्रयास करते है, सामने वाली की नकारात्मकता को भी हम नजरअंदाज करने में सक्षम हो जाते है. दुसरे लोग हमें देखकर हमारे जैसा बनने का प्रयास भी करते है. इसके विपरीत नकारात्मक नजरिया अपनाने से हम खराब व्यक्तित्व के स्वामी बनते है । सकारात्मक विचारों के अभाव में हम दूसरों की बातें न तो ध्यान से सुनते हैं और न ही उनकी बातों को महत्व देते हैं। अगर हमें अच्छे व्यकित्व वाला बनना है, तो हमें दूसरों की बातें ध्यान से सुनने की विधि सिखनी होगी।
यहाँ हर कोई चाहता है कि ‘मेरी बात कोई सुने।’ लेकिन मुझे लोग तभी सुनेगे जब हम वैसी बाते बोलेंगे. हर व्यक्ति समाज में महत्वपूर्ण होना चाहता है लेकिन उसकी कुछ कीमत देनी होती है, जब तक हम वो कीमत अदा नहीं करेंगे तब तक ये हासिल नहीं होगा. कामयाबी कभी भी आराम के कोख से पैदा नहीं होती. उसके लिए कुछ एक्स्ट्रा तो करना ही पड़ता है. वो जो एक्स्ट्रा हमें करना है प्रति दिन थोडा थोडा करते रहे, ज्यादा नहीं बस दूसरों की तुलना में 1% अधिक सकारात्मक हो जाए, लोगों की बाते अधिक सुने, 1% ज्यादा पुस्तेके पढ़ें, ज्यादा लोगों की मदद करे तो यह 1% एक दिन अपने आस पास के लोगों से इतना आगे कर देगा कि सोचा नहीं जा सकता.
तो चलिए आज से हम यह प्रण लिया जाय कि जब भी हम किसी से बातचीत करेंगे, या चर्चा करेंगे तो पहले उन्हें धैर्य के साथ पूरी बात सुनेंगे और फिर उसकी बातों को समझकर धीरज और विवेक से उनका जवाब देंगे- पहले सुना जाएगा फिर सुनाया जायेगा। साथ में कुछ एक्स्ट्रा करते रहना है क्योंकि कुछ करना, कुछ न करने से बेहतर होता है.
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