समाज में ऐसे काफी लोग मिल जायेगे जिनके ये पिक्चर अबूझ पहेली है. इस पहेली को समझने के हमे कुछ पुस्तकें पढ़नी पड़ेगी तब जाके इसका महत्व और मतलब समझ में आएगा. कुछ किताबो के नाम इस प्रकार है -बिज़नस स्कूल, कैश फ्लो क्वाड्रेंट, रिटायर यंग रिटायर रिच, रिच डैड पुअर डैड , पैराबोला ऑफ़ पाईप लाईन, कोपी कैट मार्केटिंग 101 आदि . इन सभी बुक को पढने के बाद सही कांसेप्ट समझ में आता है . वैसे अपने आस पास बारीकी से मूल्यांकन किया जाय तब भी आसानी से समझा जा सकता है लेकिन उसके लिए जिस तरह की दृष्टि और समझ चाहिए वो आसानी से नहीं मिलता। बहरहाल जो भी हो, मुख्य विषय पर आते है। इन किताबो में बताया गया है कि हम अपना जीविकोपार्जन के लिए कौन सा पेशा करते है, उस पेशे का हमारे जीवन पर कितना असर होता है, वो समाज में हमें कहां लेकर जाता है और उसका क्या परिणाम मिलता है। वो कहते है न कि अपने लिए तो सभी जीते है, सफल जीवन तो वो होता है जिसमें हम दूसरे लोगों को भी आगे लेकर चलते है। हमे कौन सा काम करना चाहिए जिससे कि हम अपना भला तो करे ही साथ में अपनी आने वाली पीढ़िया और समाज के लिए भी कुछ कर सके। इस विषय पर बहुत अच्छे से प्रकाश डाला गया है।
आईये थोडा डिटेल में चलते है . रैगनर नर्क्से नामक अर्थशास्त्री ने '' गरीबी के दुश्चक्र '' को परिभाषित किया है जिसमे इन्होने बताया है कि ये एक ऐसा चक्र होता है जिसमें कोई अर्थव्यवस्था फंसी रहती है। किसी देश में यह दुश्चक्र अनेक शक्तियों का ऐसा चक्रीय समूह होता है जो एक-दूसरे को प्रभावित करता है। एक गरीब देश में आय कम होती है जिससे बचत भी कम होती है, कम बचत के कारण निवेश भी कम होता है, जिससे इंडस्ट्री नहीं बढ़ती है और उत्पादकता कम होती है, इससे रोजगार भी कम मिलता है और पुन: कम आय को उत्पन्न करती है । देश निकालने की लाख कोशिश करता है लेकिन निकल नहीं पाता। ठीक उसी प्रकार रोबेर्ट टी कियोसाकी ने व्यक्ति के लिए चूहा दौड़ यानी Rat Race की परिभाषा दिया है जिसमें आदमी व्यस्त तो हमेशा रहता है लेकिन उपलब्धियां कुछ नहीं मिलती। उन्होंने कहा है कि मध्यम वर्ग हमेशा इसमें पिसा रहता है और उसे पता ही नहीं होता कि वो कर क्या रहा है और करना क्या चाहिए। जब हम एक आम मध्यम वर्ग की लाइफ को देखते है , वो खूब मन लगा के पढता है किसके लिए नौकरी के लिए और जीवन भर गरीब रहने का रास्ता चुनता है क्योंकि नौकरी मतलब पूरे जीवन रेंगकर व्यतीत होता है। गाड़ी लोन पे, मकान लोन पे ,घर का सारा सामान लोन पे और कर्ज की किस्ते चुकाते चुकाते जीवन की इह लीला को समाप्त कर लेते है और कोई जान भी नहीं पाता। फिर भी वही आदमी अपने बच्चो को अपने जैसा ही बनाने का प्रयास करता है। कितना बेवकूफाना काम करता है वो। संतोषम परम सुखं में रहता है। अपने पैसे का 80% मार्केट में खर्च करता है और 20% बचत में से सपने पूरा करने को सोचता हैै। क्या ये संभव है ? दरअसल उसकी समस्या उस आय की प्रकृति की होती है जिसे वो समझ ही नहीं पाता। दुर्भाग्य से अपने देश में पैसे की समझ के बढ़ाना ही नहीं चाहते लोग। उन लोगो के लिए ये उबाऊ विषय है . यदि आप लोगो को जीवन में आर्थिक रूप से फ्री होना है तो इस पैसे की समझ को बढ़ाना ही होगा। हमारी मूल समस्या पैसा है तो इसकी प्रकृति और स्रोतों के बारे में जानना पड़ेगा।
वैसे आम लोगो से बात की जाय कि आय/इनकम कितने प्रकार का होता है तो सभी लोग कहेगे की दो प्रकार का 1- नंबर 1 की इनकम और 2- नंबर 2 की इनकम जो भ्रष्ट तरीके से मिलती है . लेकिन यहाँ पे बताया गया है की दो प्रकार की होती तो है लेकिन रेखीय या एक्टिव इनकम और एक्स्पोंसिअल या पैसिव इनकम। एक में बहुत स्लो गति से बढ़ती है जैसे 1, 2, 3, 4, 5 .... इसमें नियमित रूप से काम करना पड़ता है, काम बंद पैसा भी बंद हो जाता है। जब कि दूसरी में बहुत तेज बढ़ती है जैसे 1, 2, 4, 8, 16 .....। शुरू शुरू में तो 0 से स्टार्ट होता है या बहुत कम से स्टार्ट होता है लेकिन धीरे धीरे एक लंबे समय इतना तेज बढ़ता है कि उसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती और इनकम के लिए सक्रियता भी कम हो जाती है, हम काम करे या न करे लेकिन इनकम बंद नहीं होती है। इन इनकमों को पाने के लिए कुल चार तरह के लोग होते है। उपर का चित्र उसी को प्रदर्शित करता है...
1) E यानी Employee अर्थात नौकरी करने वाले --
ये जीवन में नौकरी करने के लिए ही पढ़ते है और अपनी सभी समस्याओं को इससे समाधान करने का प्रयास करते है, सोचते है कि सभी सपने पूर्ण हो जाएंगे। ये पढ़ने लिखने मे स्कालर होते है ये जानते है किसी भी काम को कैसे किया जाय। इनका "How यानी कैसे किया जाय" काफी स्ट्रॉन्ग होता है। ये शिक्षा लेके एक योग्यता बनाते है और उसी योग्यता को बेचने का काम करते है। हालांकि कोई इसे स्वीकार नहीं करता है, लेकिन यही यथार्थ और यही कटु सत्य है। हम अपनी योग्यता को बेचते है तो हमें सेलरी मिलती है। जितने समय बेचते हैं उतनी इनकम होती है, कुछ लोग अतिरिक्त योग्यता जैसे Btech और एमबीए साथ कर लिए, अर्जित करके थोड़ा ज्यादा पैसा कमाते है, लेकिन यह इनकम तभी तक मिलती है जब तक उसे टाइम के अनुसार बेचते हैं. जिनकी जितनी बड़ी योग्यता उतनी बड़ी इनकम। ये अस्थाई इनकम होती है जो उसके जीवन के साथ ही ख़त्म हो जाती है। नौकरी करने वालो को यह अधिकार नहीं होता कि अपने बच्चो को अपने बाद वहां बैठा दे। उन्हे भी शून्य से शुरू करनी पड़ती है। अब तो सरकारी नौकरियो में पेंसन और आश्रित कोटे की नौकरी के भी लाले पड़ गए है.
आय = योग्यता * समय
अब मान लेते है कि उन्हे इनकम बढ़ाना है तो या तो समय बढ़ावे या फिर योग्यता जिसकी एक सीमा है। ईश्वर ने एक मामले में सभी के साथ न्याय किया है वो ये कि सभी को 24 घंटे का समय दिया है। चाहे राजा हो या भिखारी सभी को 24 घंटे, किसी को भी एक्स्ट्रा एक मिनट भी नहीं मिलता। योग्यता के लिए मान लेते है कि कोई मैथ का teacher है और सरकार मैथ की सभी नौकरिया ख़त्म कर दे तो ये संभव नहीं होगा की वो फिर से कोई डिग्री ले, कोई दूसरी योग्यता बनाए, कोई और नौकरी करे .वैसे भी रिटायर मेंट पे इनकम भी आधी हो जाती है . अंत में डिपार्टमेंट भागवत गीता पकड़ा के नमस्कार कर लेता है .बच्चे को भी एकदम नए सिरे से स्टार्ट करना पड़ता है . .
2- S यानी Self Employee - हिंदी में कहे तो स्वरोजगारी
अब आईये चर्चा करते है यस पे . एस मीन्स सेल्फ एम्प्लाई यानि स्वरोजगारी . इसमें होता क्या है व्यक्ति अपने अन्दर कोई गुण विकसित करके छोटा सा सिस्टम बनता है और खुद को ही नौकरी पे रख लेता है . चुकी वो अपने क्षेत्र का एक्सपर्ट होता है इससे उसे लगता है की सबसे बढ़िया काम वही कर सकता है। इसमें दुकानदार , प्लम्बर, आर्किटेक्ट, डाक्टर, वकील, सीए आदि आते है। ये अपने योग्यता और समय के साथ पूंजी का भी प्रयोग करते है जिससे ये थोड़ा बेहतर स्तिथि में होते है। लेकिन इनके यहाँ सबसे बड़ी जरुरी ये होता है कि अपने आपको लगातार अपडेट करते रहे अन्यथा दूसरा उनको मार्केट से बाहर करके उनका स्थान ले लेगा। इनका इनकम सूत्र ये है
योग्यता * समय * पूजी = मनी
इनमे से कोई भी जीरो होता है तो इनकम भी जीरो हो जाता है .अर्थात अस्थायी आय होती है। काफी ऐसे सेल्फ एम्प्लाई ऐसे लोग मिलते है जो अपने आपको बिज़नस मैन बताते है. लेकिन ऐसा नहीं होता। बिज़नस का सीधा फंडा है कि यदि हम महीने साल भर काम करना बंद कर देते है तो इनकम कम न हो। चेक करे कि महीने दो महीने हम काम नहीं करते है, तो क्या इनकम आती रहेगी, यदि उत्तर हां मिले तो बिजनेस में है अन्यथा स्वरोजगारी। यानी हम असुरक्षित है।
3) B यानी Business
ये अपने आप में बिलकुल अलग ही विधा होती है। फ़ोर्ब्स मैगजीन के अनुसार यदि आपके लिए 500 से अधिक व्यक्ति काम करते है और आप के बगैर रहे वो काम हो रहा है तो इसका मतलब आप बिज़नस कर रहे है. ये लोग काम नहीं करते है बल्कि काम किससे और कैसे कराया जाय यही सीखते है। ये खुद कोई खास पढ़े लिखे नहीं होते है लेकिन कैसे काम लिया जाय बखूबी जानते है। इनका ह्वाई अर्थात काम क्यों किया जाय, एकदम क्लियर होता है। यदि किसी उद्योग पति को कोई नया कारोबार करना है तो क्या करते है ये। एक छोटा सा उदाहरण लेते है कि मान लीजिए किसी को कोई ब्रेड की फैक्ट्री लगानी है तो क्या करते है ? मजदूरों को खरीद लेते है, कैसे बनता है उसके लिए इंजीनियर, एक एमबीए किया हुआ मैनेजर, अकाउंट, होलसेल, रिटेल आदि सभी के लिए अलग अलग लोगों को नौकरी पर रख लेते है। स्वयं फ्री रहते है। और इनकम की बात की जाय तो सबसे अधिक कमाते है क्योंकि सभी लोग बिजनेस मैन के लिए काम करते है। यदि उस ब्रेड फैक्ट्री में 50 लोग भी 8/8 घंटे नौकरी करते है तो बिजनेस मैन के लिए एक दिन के लिए कुल काम होता है
50*8=400 घंटे
तो बिजनेस मैन को कमाई होती है 400 घंटे की, जबकि नौकरी करने वाले को मिलता है मात्र 8 घंटे का पैसा और दूसरी चीज किसी एक नौकरी करने वाले को कुछ होता है तो उसकी तो दुनिया ही उजड़ जाती है लेकिन बिजनेस मैन की इनकम पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। इनके मरने के बाद इनके परिवार के लोग बिजनेस संभाल लेते है जो पीढ़ियों तक चलता है। कुल मिलाकर ये सबसे अधिक सुरक्षित होते है।
4)I यानी Investor हिंदी में निवेशक
ये वो लोग होते है बिजनेस में पैसा लगाकर पैसे से पैसा बनाते है। पैसा इनके लिए काम करता है।
अभी लिखना बाकी है।
Is lekh se hume prerna milti hai, ki hume bhi apne investment ko theek se well planned manage kerna chahiye.
जवाब देंहटाएंGreat!!!
Well done!!!