पिछले दिनों 25 फरवरी को मैं कार्यालय के मुख्य द्वार पर खड़ा था वो अचानक दिख गए, छड़ी का सहारा लेकर चलते हुए। कई वर्षों बाद दिखाई दिए थे। कई वर्ष पहले मेरे विभाग में ड्राइवर थे वे। छड़ी देखकर पहले तो समझ में आया कि कोई चोट लगी होगी जिसके कारण चलने में दिक्कत के कारण छड़ी लिए है। बातो बातो में पता चला कि उनके पैरों की नसों में दिक्कत आ गई थी, रक्त प्रवाह सुचारु रूप से नहीं होता था, डॉक्टर को दिखाया गया, इलाज एम्स दिल्ली में चला जहां डॉक्टरों ने रक्षा के लिए कि जहर आगे न फैले और इनके पैर को काट दिया। एक ड्राइवर के लिए पैरों का न होना, कितनी दुखद बात है। वो आगे अपनी नौकरी कर पायेगा। मेरे लिए एकदम सदमे वाली स्थिति रही। हालांकि उनसे मेरा कोई संबंध नहीं था, बस एक दूसरे को पहचानते थे, नाम भी नहीं पता था। बहरहाल वो स्वैच्छिक सेवानिवृति के लिए अनुरोध किया जिसे अस्वीकार करते हुए उनके प्रतिस्थितियों को देखते हुए कार्यालय की जिम्मेदारी दी गई। आज कार्यालय के सामने आवास की सुविधा दी गई है। उन्होंने परिस्थितियों को स्वीकार करके अच्छे से जीवन व्यतीत कर रहे है।
जो हो गया स्वीकार कर लिया जाय तो जीवन कितना खूबसूरत हो सकता है। जो हो गया उसके बारे यदि हम चिंता करते है तो किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं होता। वो केवल नुकसान ही करता है। अपने सामने कई बार ऐसी परिस्थिति पैदा हो जाती है जिसे हम बदल नहीं सकते, स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं होता। केवल परिस्थितियां ही हमें सुखी या दुखी नहीं बना सकती। इन परिस्थितियों के प्रति हमारा नजरिया क्या है, इसी से हमारी भावनाएं तय होती है। रविंद्र जैन को कौन नहीं जानता वो समझ गए थे कि अंधा होना दुख का कारण नहीं है, दुख का कारण है अंधेपन को झेल पाने की योग्यता न होना। अगर हम विरोध करे, उससे कुश्ती लड़े तब भी जो हो चुका है, को बदल नहीं सकते। परंतु हम अपने आपको बदल लिया जाय तो जरूर कुछ अच्छा हो सकता है।
तो जीवन में जिसे बदला नहीं जा सकता, उसको स्वीकार कर आगे की ओर बढ़ा जाय।
अति सुन्दर लेख
जवाब देंहटाएंबेहतरीन लेख
जवाब देंहटाएंसत्य वचन
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