हम सभी की दो छवियाँ होती है एक तो वो जो हम लोगों को दिखाते है जिसे सामाजिक छवि कहा जा सकता है और दूसरा वो जो हम वास्तव में होते है यानी व्यक्तिगत .
जून 2018 में मध्य प्रदेश में राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त आध्यामिक गुरु ने आत्महत्या कर लिया था तो लोग काफी आश्चर्यचकित हो गए थे कि जो दूसरों को सद्मार्ग पर चलने को राह दिखने वाला क्या स्वयं भी भटक सकता है. उस समय इस विषय को लेकर काफी चर्चाये हुयी. और यही ही नहीं ऐसे अनगिनत उदाहरण मिल जाते है जो बाहर की दुनिया में दूसरों को बड़े बड़े सपने दिखाते है, लोगों को एक नयी दिशा दिखाते है और अन्दर से कुछ और ही होते है. पिछले साल का मशहूर फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत द्वारा आत्महत्या करना उसमें से एक उदाहरण है. हमें अक्सर आस पास दिख जाता है कि क्यों
कुछ लोग अच्छे होने के बाद भी सफल नहीं होते, जबकि कुछ सफल होने के बाद भी
अच्छे नहीं होते? क्या वजह है कि सफल व्यक्ति बड़ी सहजता से बुरा काम कर
देता है? कारण वही एक ही होता है व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में भारी अंतर का होना. व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन दोनों अलग अलग चीजे है और दोनों के साथ आदमी जीवन जीते है. इसलिए हम अपने बारे में जो बोलते या लिखते हैं, जरूरी नहीं कि वैसे हम हों भी। यह भी जरूरी नहीं कि समाज में हमारी जैसी छवि है, हम बिल्कुल वैसे ही हों।
सामाजिक छवि अक्सर हमारे विचारों और दूसरों के लिए गए कृत्यों पर निर्भर करती है. ये जितने बड़े होंगे हमारी सामाजिक छवि भी उतनी ही बड़ी होगी. हमे अपने सामाजिक छवि पर ध्यान ज्यादा देना चाहिए क्योंकि ये जितना ही बड़ा होगा दूसरों का उतना ही भला होगा. महान व्यक्तित्व अपने इसी छवि से समाज को दशा और दिशा दिखाते है. एक छोटा सा उदाहरण लेते है हम. माना कि हम सामाजिक प्रतिष्ठा बढाने के लिए कोई छोटा सा बिजनेस करने को सोचते है. अब सबसे पहले को कार्यालय लेंगे, उसके रंग रोगन करवाएंगे, उसमें कुछ संसाधन रखेंगे, कुछ कच्चा माल रखेंगे और हो सकता हो तो 2/4 लोगों को कम पर भी रखेंगे. कुल मिलाकर देंखेंगे कि इस छोटे से बिजनेस स्टार्ट करने में ही 10/20 लोगों को कुछ न कुछ रोजगार और कमाई करा देते है. इसलिए सामाजिक व्यक्तित्व को लगातार बड़े करते रहना चाहिए. हमारे अन्दर लाख व्यक्तिगत स्तर पर बुराईयाँ हो लेकिन सामाजिक व्यक्तित्व को लगात बड़ा करते रहना चाहिये. कोई इस दुनिया में पूर्ण नहीं है. हम सभी अच्छाई और बुराई का समुच्चय है, अन्दर अच्छाई भी मिलती है और बुराई भी. हमारा काम है अपने अच्छाई को लगातार बढाते रहना. हालांकि जब लोगों द्वारा उन बुराइयों के सच को जाहिर किया जाता है, तो अक्सर वह कड़वा लगता है, लेकिन फिर भी अपने रोकना नहीं है।
अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि जो सही है, वह हमेशा लोकप्रिय नहीं होता और जो लोकप्रिय है, वह हमेशा सही नहीं होता। यह बात खुद उनके ऊपर भी लागू होती है। उन्होंने खराब आर्थिक निवेश किए, अपनी पत्नी के प्रति वफादार नहीं रहे और अपने दो बेटों से उनके संबंध कभी अच्छे नहीं रहे। इन बातों पर गौर करेंगे, तो वह आदर्श नहीं दिखेंगे, पर उनका दुनिया को किये गए योगदान को कौन नहीं जनता। दुनिया को किया गया योगदान की वैल्यू कभी भी कम नहीं होगी। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के कुछ ऐसे स्याह पहलू होते है जिसे वो लोगों के सामने लाना नहीं चाहता या आने से डरता है. लेकिन उस स्याह पहलू का मतलब यह नहीं होता कि अपने आपको रोक लिया जायया आगे न बढ़ा जाय.
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