मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

महाभियोग क्या होता है

महाभियोग क्या है ?--------

महाभियोग एक प्रक्रिया है जिसका प्रयोग राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जजों को कार्यवधि पूर्ण होने से पूर्व हटाने के लिए किया जाता है। इसका वर्णन संविधान के अनुच्छेद 61, 124 (4), (5), 217 और 218 में मिलता है। महाभियोग प्रस्ताव सिर्फ़ तब लाया जा सकता है जब संविधान का उल्लंघन, दुर्व्यवहार या अक्षमता साबित हो गए हों। नियमों के मुताबिक़, महाभियोग प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है। लेकिन लोकसभा में इसे पेश करने के लिए कम से कम 100 सांसदों के दस्तख़त चाहिए होते हैं और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के दस्तख़त ज़रूरी होते हैं। इसके बाद अगर उस सदन के स्पीकर या अध्यक्ष उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लें (वे इसे ख़ारिज भी कर सकते हैं) तो 3 सदस्यों की एक समिति बनाकर आरोपों की जांच करवाई जाती है। उस समिति में एक सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस और एक ऐसे प्रख्यात व्यक्ति को शामिल किया जाता है जिन्हें स्पीकर या अध्यक्ष उस मामले के लिए सही मानें।

वर्ष 2018 में न्यायपालिका की आजादी पर चिंता और सरकारी दखल का आरोप लगाते हुए राजनितिक पार्टी कांग्रेस ने 7 दलों के साथ मिलकर मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था जिस पर  राज्यसभा के लगभग 64 सांसदों ने हस्ताक्षर कर दिए हैं। कांग्रेस, एनसीपी, सीपीआई, सीपीएम, एसपी, बहुजन समाज पार्टी और मुस्लिम लीग महाभियोग का समर्थन कर किए थे। कांग्रेस का आरोप था कि सीजेआई दीपक मिश्रा द्वारा पद का दुरुपयोग करते हुए कई संवेदनशील मामलों को चुनिंदा बेंच को सौंपा गया, केस की सुनवाई में बैक डेटिंग की गई।  हालांकि महाभियोग पूरा नहीं हो सका। 
भारत में आज तक किसी जज को महाभियोग लाकर हटाया नहीं गया क्योंकि इससे पहले के सारे मामलों में कार्यवाही कभी पूरी ही नहीं हो सकी या तो प्रस्ताव को बहुमत नहीं मिला, या फिर जजों ने उससे पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया. सुप्रीम कोर्ट के जज वी. रामास्वामी को महाभियोग का सामना करने वाला पहला जज माना जाता है. उनके ख़िलाफ़ मई 1993 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था. यह प्रस्ताव लोकसभा में गिर गया क्योंकि उस वक़्त सत्ता में मौजूद कांग्रेस ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया और प्रस्ताव को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला. कोलकाता हाईकोर्ट के जज सौमित्र सेन देश के दूसरे ऐसे जज थे, जिन्हें 2011 में अनुचित व्यवहार के लिए महाभियोग का सामना करना पड़ा. यह भारत का अकेला ऐसा महाभियोग का मामला है जो राज्य सभा में पास होकर लोकसभा तक पहुंचा. हालांकि लोकसभा में इस पर वोटिंग होने से पहले ही जस्टिस सेन ने इस्तीफ़ा दे दिया.

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