रविवार, 11 अप्रैल 2021

soorarai pottru फिल्म के बारे में

साउथ इंडियन फिल्मों को देखने का एक लग ही मजा होता है, जिस तरीके से दक्षिण के निर्देशक कहानी कहते है, शायद हिंदी फिल्मों के निर्देशक नहीं कर पाएंगे। उनकी जिस तरह कल्पनाएं होती है, जिस तरीके से नायकों को जिस तरह से प्रस्तुत किया जाता है, हिंदी फिल्में नहीं कर पाती है। बहरहाल बात करते है कि सूर्या की फिल्म sorarai pottru की जिसका हिंदी संस्करण हाल ही में आया है। डेक्कन एयरलाइन के संस्थापक कैप्टन गोपीचंद के संघर्ष पर आधारित काफी मोटिवेशनल फिल्म है।  सस्ती फ्लाइटों की शुरुवात कैसे हुई, उसके लिए रास्ते में कितनी बाधाएं आई, कैसे कैसे रोकने के प्रयास किए गए और फिर इन संकटों से कैसे पार पाकर अपने सपने को मूर्त रूप दिया, यही इस फिल्म में दिखाया गया है।
फिल्म परेश रावल जेज एयरलाइन (शायद जेट एयरवेज को इंगित किया गया है) के मालिक है, किंगफिशर एयरलाइंस और उसके प्रमोटर विजय माल्या को भी दिखाया गया है।
  फिल्म के नायक मारन को एक जिद है कि वो ट्रेन के दाम पर हवाई जहाज की सेवा लोगों को उपलब्ध कराना है। उसका मानना है कि जो सेवाएं अमीरों के लिए है वो एक समय बाद आम लोगों की भी जरूरत बनती है। पहले बिजली, कार सिर्फ अमीरों के लिए थी लेकिन अब सबके लिए है, हवाई जहाज सेवा भी गरीबों के लिए होना चाहिए। इस सपने को पहले से स्थापित एयर लाइन कंपनियां रोकने का प्रयास करती है। मिलकर डीजीसीए से लाइसेंस नहीं होने देती है, जहां से हवाई जहाज किराए पर मिलना होता है, नहीं देने देते है। कहीं मिलता है तो पायलट को खरीदकर गड़बड़ी करवाते है। लेकिन अंततः वह कार्गो छोटे प्लेन और एयर फोर्स की मदद से अपने सपने को वह पूरा करता है, 1 रूपये में लोगों को फ्लाइट का सफर करवाता है। फिल्म में बार बार रतन टाटा का भी जिक्र किया गया है कि वो भी चाहते है हवाई सेवा शुरू करना लेकिन इसमें इतना जोखिम है कि वो नहीं कर पाते है, तुम कैसे कर पाओगे।

   हवाई सेवा शुरू से भारी भरकम लागतों का बिजनेस है। इसमें फ्यूल, कर्मचारियों के वेतन इतने अधिक होते है कि फायदे का सौदा नहीं रहता। निवेश के मामले में इससे बचने का प्रयास किया जाता है। भारत में इन्हीं कारणों पिछले 10/15 सालों में सहारा, किंगफिशर, जेट की सेवाएं बंद हो चुकी है। विकिपीडिया और फिल्म यह बताता है कि 2003 में एयर डेक्कन की शुरुआत के समय किराया कम से कम 6 हजार होता था जिसे गोपीनाथ ने उस टिकट को 1000 रूपये में बेचना शुरू किया और फ्लाइट में कुछ टिकटें 1 रूपये की रखी। एक समय में गोपीनाथ के इस ड्रीम प्रोजेक्ट को उड़ान के नाम से भारत सरकार ने शुरू किया था। देश में सस्ती एयरलाइन सेवाओं की शुरुवात का श्रेय कैप्टन गोपीनाथ को ही जाता है। उन्होंने यात्रा के दौरान के ब्रेक फ़ास्ट, लंच, समाचार पत्र आदि में से पैसा बचाया, प्लेन को खरीदने के बजाय किराए पर लिया, बड़े प्लेन की जगह छोटा प्लेन लिया, नए पायलटों की जगह एयर फोर्स से रिटायर पायलटों को सेवा पर लिया। फ़िल्म में दिखाया गया है कि  विजय माल्या डेक्कन को खरीदना चाह रहे थे जिसका ऑफर कैप्टन गोपीनाथ ने ठुकरा दिया जबकि वास्तविकता तो यह है कि विजय माल्या ने ही एयर डेक्कन को 2007 में खरीदा और नाम दिया किंगफिशर रेड। 
    फिल्म जबरदस्त तरीके से उद्यम शुरू करने वालों को प्रेरणा प्रदान करती है कि रास्ते में कितने भी बाधाएं क्यों न आए लेकिन लगे रहे तो सपने अवश्य पूरे होगे।

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