शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

कम्पनियों के शेयर होल्डिंग पैटर्न

आज हम बात करेंगे कंपनियों के शेयर होल्डिंग पैटर्न के बारे में क्योंकि किसी कम्पनी में निवेश करने के लिए एक महत्वपूर्ण मानक होता है। इसे समझने के लिए एक उदाहरण लेते है कि आपने कोई दूकान खोली जिसमें पूरा इन्वेस्टमेंट आपने स्वय किया तो आप पूरी कंपनी के होल सोल मालिक होते है, प्रत्येक निर्णय लेने के लिए हम अधिकृत होते है, लाभ हानि में हिस्सेदारी किसी की नहीं होती है. दुसरे प्रकार में जब अपने किसी करीबी मित्र रिश्तेदार को हिस्सेदार बनाते है तो उस कंपनी पर खुद का मालिकाना हक़ नहीं रह जाता है. जो भी  कम्पनी में निर्णय लेने होने होते है सभी की सहमति से होता है. और जब बिजनेस को आगे बढ़ने के लिए स्टॉक मार्केट का सहारा लेते है तो तस्वीर और बदल जाती है. जिसके पास जितनी संख्या में शेयर होते है उसकी उतनी हिस्सेदारी भी होती है. कंपनी के मालिक का अब पहले जैसा अधिकार नहीं रह जाता है कोई भी नीतिगत निर्णय लेने के लिए शयरधारकों की राय लेनी पड़ती है. जो व्यक्ति या परिवार बिजनेस की शुरुआत किया रहता है या फिर सबसे बड़ा शेयर धारक प्रमोटर कहलाता है. सामान्यतया निम्न लिखित किस्म के शेयर धारक होते है 
1-प्रमोटर, 
2-संस्थागत निवेशक जिसमे FII, DII और म्यूचुअल फंड आते है 
3-दिग्गज निवेशक और 
4-रिटेल यानी खुदुरा निवेशक हमारे आप जैसे छोटे निवेशक 
 कंपनी 1% से अधिक हिस्सेदारी वाले शेयर धारकों की अलग से सूची घोषित करता है. 
 
सभी किस्मों की किसी कंपनी में किस तरह की हिस्सेदारी है, उससे काफी संकेत मिलते है। निवेश सम्बन्धी निर्णय लेने में काफी बारीकी से मूल्यांकन किया जाता है. निवेशा के लिए इनकी हिस्सेदारी 50 से अधिक होनी चाहिए.  कम्पनी के सबसे महत्वपूर्ण शेयर धारक होता है प्रमोटर इनकी जीतनी अधिक हिस्सेदारी होती है उतना ही सही माना जाता है। हिस्सेदारी के साथ साथ उसके चाल चलन, दूरदर्शिता, रहन सहन आदि को भी ध्यान से देखा जाता है.   यदि प्रमोटर अच्छे होते है तो कितना ही खराब बिजनेस क्यों न हो, उसे अच्छा बना लेते हैं और यदि प्रमोटर खराब होता है तो अच्छे से अच्छे बिजनेस को खराब कर देते हैं। तो किसी भी कंपनी के प्रमोटर की क्वालिटी पर सबसे पहले ध्यान देना चाहिए। उसके लिए उनकी रिजल्ट के समय जो कमेंट्री दी जाती है तो उसे ध्यान से पढ़ने और समझने चाहिए। उसके विरुद्ध कोई वित्तीय अनियमितता का आरोप तो नहीं लगा है। यदि ऐसा होता है तो निवेश नहीं करना चाहिए। मार्केट के दिग्गज निवेशक विजय केडिया कहते है कि खराब प्रमोटर के साथ बिजनेस करना अपने दुश्मन के साथ सोने के सामान है जो कभी भी विश्वासघात कर सकता है।  प्रमोटर किसी कम्पनी का मालिक नहीं होता है बल्कि वो सबसे ज्यादा शेयर होल्डर होता है।  समयानुसार व आवश्यकतानुसार प्रमोटर विविध तरीके से कम्पनी में अपनी होल्डिंग शेयर मात्रा घटाते बढ़ाते रहते है। इस पर भी जिगाह रखनी चाहिए यदि उनकी हिस्सेदारी बढ़ रही होती है तो बढ़िया माना  जाता है. कई बार ऐसा होता है कि जब कंपनी बिजनेस बढ़ाने के लिए पैसे नहीं जुटा पाती तो अपने हिस्सेदारी प्लेज यानी गिरवी रखकर बैंकों से कर्ज ले लेती है. इस प्रकार हिस्सेदारी के साथ साथ प्रमोटर अपने शेयर प्लेज तो नहीं कर रहे है, प्लेज किये है तो कितना किये है, का भी ध्यान देना चाहिए. प्लेज जितना ही कम होता है उतना ही बढ़िया माना जाता है. प्लेज जितना ही अधिक मतलब स्टॉक उतना ही खराब क्योंकि उन शेयर से प्रोमोटर का अधिकार नहीं रह जाता है, और यदि कंपनी कर्ज भुगतान में डिफ़ॉल्ट करती है कर्ज देने वाली वित्तीय संस्थान उसे जब्त कर लेती है जैसे कि अनिल अम्बानी समूह की कंपनियों के साथ हुआ.
 
प्रमोटर के अतिरिक्त संस्थागत निवेशक निवेशक होते है यह दो प्रकार के होते है एक घरेलु संस्थागत निवेशक  (DII) जिसमें म्यूच्यूअल फण्ड, इंश्योरेंस, होते है दुसरा विदेशी संस्थागत निवेशक भी करते है जिन्हें FII/FPI कहते है।सामान्य तौर पर इनकी भी जितनी ही अधिक हिस्सेदारी होती है कंपनी के लिए उतना ही बढ़िया समझा जाता है. ये लोगों से पैसे लेकर इन्वेस्टमेंट करते है और इनके पास एक रिसर्च टीम होती है जो कंपनियों की फाइनेंसियल हेल्थ देखकर शेयर खरीदती है. चुकी खरीदारी काफी बड़ी बड़ी और लॉन्ग टर्म के लिए होती है इसलिए बाकायदा ठोक बजाकर  ही खरीदारी करते है. तो इन निवेशक को यह जितनी अधिक हिस्सेदारी होती है उतना ही बढ़िया होगा. यदि किसी कंपनी की प्रोमोटर हिस्सेदारी कम है तो फिर यहाँ ध्यान देना चाहिए कि ये हिस्सेदारी कितनी बड़ी है. यह जितना ही अधिक होगा उतना ही बढ़िया. रिटेल निवेशको की हिस्सेदारी से काफी अधिक होनी चाहिए .
 
इसके बाद बड़े निवेशक होते है जिनकी हिस्सेदारी 1% से अधिक होती है. वैसा इनकी हिस्सेदारी उतनी महत्वपूर्ण नहीं मानी जाती है फिर भी दिग्गज निवेशक जैसे राधा किशन दामनी, रमेश दमानी, शंकर शर्मा, विजय केडिया, डोली  खन्ना, अनिल अग्रवाल आदि जैसे निवेशको की हिस्सेदारी होने से कंपनी के मजबूत होन समझा जाता है. 
 
चौथा रिटेल निवेशक या खुदरा निवेशक होता है जो हमारे आप जैसे लोग थोड़े मात्रा में शेयर खरीदते बेचते है। यदि किसी कंपनी में रिटेल की हिस्सेदारी बहुत अधिक है तो सतर्क हो जाईये वो कंपनी के खराब होने के संकेत है. रिटेल इन्वेस्टर मार्किट की एनालसिस नहीं करते है और जिस कंपनी के भाव गिरते है उसे बढ़ने की उम्मीद में खरीदते जाते है जो कि फंस जाते है आप इसे YES बैंक, जेपी, दीवान हाउसिंग, पीसी ज्वेलर, अनिल अम्बानी समूह की कंपनियों जैसे अनगिनत कंपनियों के आकड़ों से देख सकते है. 

यहां एक और एक खास बात ध्यान में रखने की जरूरत होती है कि स्माल कैप श्रेणी के या बहुत कम लोकप्रिय स्टॉक में थोड़ा अलग नजरिया अपनाया जाता है। हिडेन जेम्स स्माल कैप में मिलते है लेकिन वहां पर आंकड़े इतने कम उपलब्ध होते है कि निवेश से पूर्व बहुत ही ज्यादा  विश्लेषण की जरूरत होती है। संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी वहां बहुत कम मिलती है, रिटेल निवेशकों की भी बहुत भागीदारी होती है।  स्टॉक का वॉल्यूम भी बहुत कम होता है। ऐसे में कम्पनी के बिजनेस पोटेंशियल और मैनेजमेंट की दूरदर्शिता का अच्छा होना बहुत जरूरी होता है। ये सभी विश्लेषण एक आम निवेशक के लिए काफी कठिन होता है। इस श्रेणी में हम 10 स्टॉक चुने तो 8 स्टॉक तो वेल्थ डिस्ट्रॉय करने वाले मिलते है दूसरी तरफ स्थापित कम्पनियों में यह आंकड़ा उलटा होता है यानी 80% स्टॉक वेल्थ क्रिएट करते है। जल्दी वैल्थ क्रिएशन स्माल कैप में होता है लेकिन इसके लिए विशेषज्ञ होना पड़ता है। निवेश के दौरान इसे भी ध्यान देवे।


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