हम लोगों के आस पास ऐसे बहुत सारे लोग होते है जो जल्दबाजी में निर्णय ले लेते है और बाद में पछताना पड़ता है। अब से कुछ साल पहले मेरा भी जल्दबाजी की आदत रही, भलाई, बुराई पर सोचे बगैर ही निर्णय ले लेते रहे जिससे बाद में उसका प्रभाव गलत होने पर पछताना पड़ता। कोई भी किसी प्रकार का निवेश योजना, कोई मार्केटिंग प्लान वाला आता तत्काल सामने वाले के ऑफर स्वीकार कर लेते जो बाद में कष्ट होता। धीरे धीरे मैंने अपनी समझ बढ़ाई, धैर्य और अनुशासन को अपनाया तब कहीं इसमें कमी आई है। अब मैं काफी सोच विचार करके निर्णय लेता हूं। कहा जाता है कि जल्दी का काम शैतान का होता है। जल्दबाजी एक ऐसी बुरी आदत है, जो जीती बाजी को हार में परिवर्तित कर देती है। जिंदगी में कई बार हमें ऐसा अनुभव होता है कि यदि हमने विषम परिस्थितियों में उत्तेजित होकर अपना आपा न खोया होता, तो शायद हमें उतनी हानि नहीं होती।
वैसे, यह मनुष्य का मूल स्वभाव है कि वह ठोकर लगने के बाद ही सोचता है कि काश मैं संभलकर चला होता। जल्दबाजी में निर्णय अक्सर भावनाओं में बहकर लेते है। वो भावनाएं क्रोध, चिंता, तनाव, खुशी, अतिविश्वास के कारण होता है और जब हम उस वातावरण से बाहर आते हैं, तब हम यह सोचने लगते हैं कि ऐसा क्या हो गया, जो हमने अपने पर नियंत्रण खो दिया?
आज सबकी मान्यता बन गई है कि ‘परिस्थितियों पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं, यह सब तो चलता ही रहेगा, होता ही रहेगा, कोई इस मायाजाल से निकल नहीं पाएगा।’ लेकिन विचारकों की मानें, तो हालात बड़ी आसानी से काबू में किए जा सकते हैं, यदि हमारी इच्छाशक्ति प्रबल हो। मसलन, हम जब सड़क पार करते हैं, तब थोड़ा ठहरकर दाएं और बाएं देखते हैं कि कोई वाहन तो नहीं आ रहा। ठीक इसी तरह जीवन रूपी मार्ग पर चलते हुए हमें ऐसी हर परिस्थिति का मूल्यांकन करने के पहले थोड़ा ठहरना चाहिए, फिर सोच-समझकर समुचित प्रतिक्रिया देनी चाहिए। इस समूची प्रक्रिया में किसी को केवल एक मिनट लगता है, तो किसी को एक घंटा और किसी को कई दिन लग जाते हैं। वैसे भी जब हम बाह्य परिस्थितियों पर नियंत्रण में असमर्थ हो जाते हैं, तब हमें अपनी आंतरिक सिस्टम को सशक्त कर स्थिर और शांत मन से उन बाह्य परिस्थितियों का मुकाबला करना चाहिए। जब बाहर को परिस्थितियां प्रतिकूल हो तो डेल कार्नेगी के अनुसार उन परिस्थितियों को लिखना चाहिए, उन परिस्थितियों के पॉजिटिव और निगेटिव प्रभावों को भी लिखना चाहिए, मस्तिष्क इस परिस्थिति से निकलने के क्या उपाय बता रहा है, उसे भी लिखना चाहिए। इस पूरे अभ्यास से काफी चीजे हमारे पक्ष में हो जाएगी। इसके लिए सकारात्मक रहते हुए इच्छाशक्ति और आत्मबल को भी मजबूत करना होगा। इच्छाशक्ति और सकारात्मकता किसी दुकान पर नहीं मिलती उसे निरंतर अभ्यास से बनानी पड़ती है। इसके लिए परम पिता परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता, विश्वास और मेडिटेशन काफी मदद करेगा। मेडिटेशन के लिए प्रतिदिन थोडा सा समय अवश्य निकालना चाहिए . कुछ क्षण के अपनी आँखे बंद कर उस इश्वर से साक्षात्कार करने का प्रयास ही हमें बहुत कुछ शक्ति दे सकता है
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