अपने आस पास स्थित प्रत्येक चीजो से कुछ न कुछ सीख मिलती है । अब इसी चित्र को देखिए जिसमें एक प्रकार का साग का बीज डाला गया था जिसके साथ अधिक मात्रा में तो अनुपयोगी घास फूस ही उग आए हैं
ध्यान से देखिए कितने खर पतवार और अनावश्यक घांस उग आये है जबकि हम सभी उसमे बीज, खाद और पानी फसल के लिए डालते है और साथ में निकल आते है घास फुस, वो भी बड़ी मात्रा में। कई बार तो ऐसा भी होता है कि ये घास फूस मूल फसल से भी मजबूत निकल कर आएगा और देखकर ऐसा लगेगा वो घास फुस ही मुख्य फसल है। ऐसा ही हमारे विचारो के साथ भी होता है। विज्ञान के अनुसार सबसे अधिक सक्रिय मानव अंग मस्तिष्क है, 24 घंटे काम करता है। हम हर समय कुछ न कुछ सोचते रहते है।
रिसर्च बताते हैं कि हमारे दिमाग में प्रतिदिन 40 से 50 हज़ार विचार आते है जिसमे से 95% किसी काम के नहीं होते। यह वैसे ही होता है जैसे कोई फसल बोई जाती है तो फसल के साथ खर पतवार और घास भी उग आते है। खाद पानी तो फसल के लिए दी जाती है लेकिन उसी खाद पानी से वो घास फूस भी फलते फूलते है। जैसे समयानुसार इन घास फूस को भी निराई गुड़ाई से निकाला जाता है ठीक उसी तरह विचारो के अनुसार भी करना चाहिए। यानी बेकार और अनावश्यक विचारों को चिन्हित कर बाहर करना
चित्र गूगल से
जैसे खेतो में नियमित रूप से निराई गुड़ाई कर अनावश्यक घास फुस को हटाया जाता है ठीक उसी प्रकार एक निश्चित अंतराल पर हमें स्वयं की भी समीक्षा कर साथ में विकसीत हो रही नकारात्मक विचार को भी ख़त्म करना होगा।
आये दिन हम मार्केट में देखते है कि सेल लगाकर भारी छूट पर बस्तुए बेचीं जाती है। बकायदा बोर्ड लगाकर स्टॉक क्लियरेंस की जाती है। हर मौसम बदलने पर ऐसे सेल दिख जाती है।
दरअसल जब व्यापारियों का गोदाम खाली नहीं होगा तब तक ज्यादा लाभ देने वाले उत्पाद नहीं रखी जा सकती। उसी तरह अपने भी मस्तिष्क के कई पुराने विचारो को भारी छूट देकर निकालने की जरुरत होती है और उसके जगह पर प्रगतिशील विचार लाने की जरुरत होती है।
रण्डा बर्न ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक रहस्य में बताया है कि प्रत्येक विचारों की एक फ्रीक्वेंसी होती है जो समान विचारों को
अपनी ओर आकर्षित करती है। जितनी मजबूत फ्रीक्वेंसी होती है, अपने जैसे उतने ही अधिक विचार आकर्षित करती है। इसका आशय है कि यदि अच्छे विचार तो और अधिक विचार आते हैं इसी प्रकार बुरे विचार होने पर गलत विचार होने लगते हैं। इसलिए विचारों का अच्छा होना बहुत जरूरी है।
अब सवाल है कि कैसे यह काम किया जाय ? क्योंकि विचार तो कोई बस्तु या घास तो है नहीं जिसे चिन्हित कर हाथ से पकड़कर अलग कर दिए जाए। इसके लिए एक और उदाहरण अपनाना होगा जैसे एक बाल्टी में गन्दा जल भरा हुआ है और शर्त यह है कि बगैर उस पानी को हटाये साफ़ करना है। अब सीधा उपाय है कि उसमे साफ़ पानी डालना शुरू कर दिए जाए । अब क्या होगा कि उसमे गन्दगी साफ़ पानी के साथ घुलना शुरू हो जायेगी धीरे धीरे यह प्रक्रिया जारी रही तो एक समय बाद उसमे केवल साफ़ पानी रह जायेगी या फिर गन्दगी नगण्य रह जायेगी। आगे ये होगा कि साफ़ पानी बाल्टी से गिरना शुरू हो जाएगा जो आस पास के क्षेत्र को प्रभावित भी करेगा। अपने मष्तिष्क को बाल्टी मान ली जाय और उसमे लगातार अच्छे और सकारात्मक विचार डालने शुरू कर दिए जाय तो एक समय बाद उसमे केवल सकारात्मकता रह जायेगी जो ओवर फ्लो होकर दुसरो को भी प्रभावित करेगी।
आपके विचार उबाऊ कहा रहते है , इस बात में बहुत सत्यता है कि आपके 1 भी ब्लॉग को ही अगर निरंतर समाहित किया जाए तो हर क्षेत्र में लोग लाभान्वित होंगे ।
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत शुक्रिया
मैने ये लिखा है कि मोटीवेशन, आर्थिक, स्वास्थ्य आदि विषय लोगों को उबाऊ लगते है, वो लोग न तो पढ़ते है और न ही पढ़ना चाहते हैं। समाचार पत्रों से वो पेज ही हटा देते है एक नजर तक नहीं डालते है। तो मैंने ये कहा है कि यदि हमारे पोस्ट लगातार पढ़ते रहे तो विषय रुचिकर लगेगा और समझ में भी आयेगा। धन्येसद
हटाएंआपने रण्डा बर्न फ्रीक्वेंसी सिद्धांत का उल्लेख करते हुए तत्काल अलग-अलग फ्रीक्वेंसी के जल तथा सेल का उदाहरण देकर विषय-वस्तु में स्पष्टता ला दी है। बहुत बहुत धन्यवाद।
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