शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

How to Select Stock For Investment निवेश के लिए स्टॉक चुनने के लिए क्या क्या देखे

मुझसे अक्सर लोग पूछा करते है कि निवेश के लिए सही  स्टॉक कैसे चुने। किस स्टॉक में इन्वेस्ट किया जाय कि हमें अधिकतम फायदा हो। मेरा अपना मत है कि 15/20 अच्छे क्वालिटी मैनेजमेंट वाले बिजनेस को चिन्हित कर बार बार खरीदारी की जाय तो एक समय उपरांत हम मार्केट को लंबे अंतर से अधिक रिटर्न मिलता है। लेकिन यह तभी होगा जब अच्छे स्टॉक लिए जाय। थोड़ी सी सावधानी रखी जाय तो आसानी से 25% से अधिक का CAGR रिटर्न लिया जा सकता है। 
 तो आइए बात करते है कि क्या क्या चेक करनी चाहिए

1) सेक्टर 
मैं किसी भी कंपनी का सबसे पहले सेक्टर देखता हूं, वो कम्पनी क्या प्रोडक्ट बनाती है, प्रोडक्ट की क्वालिटी कैसी है, क्या प्रोडक्ट हमेशा प्रयोग में रहेगा, दुसरी कौन कौन सी कंपनियां है जो वैसे उत्पाद बनाती है, होती कंपनी का उत्पाद दूसरी कंपनियों के उत्पाद की तुलना में कितना टिकाऊ है। क्या उस सेक्टर ने पहले पैसे बनाकर दिए है कि नहीं ? सेक्टर के दूसरे स्टॉक्स की तुलना में इसने कैसा प्रदर्शन किया है ? आदि

2) कम्पनी कब से लिस्टेड है 
यह भी एक अहम मानक माना जाता है। काफी कैन इन्वेस्टिंग में उन कंपनियों में निवेश का बल दिया जाता है जो कम से कम 10 साल से मार्केट में लिस्टेड है। क्योंकि यदि कम्पनी 10 साल से लिस्टेड है तो इसका सीधा सा आशय यह है कि वह कंपनी मंदी, तेजी सभी के तरह के दौर को देख चुकी है, समस्याओं से निकलने का उसके पास हुनर होगा। इनका बिजनेस भी स्थापित होता है और निवेश करने पर जोखिम भी कम होता है। 

3)मैनेजमेंट कैसा है 
किसी बिजनेस के ग्रोथ करने में मैनेजमेंट का बहुत बड़ी भूमिका होती है। अच्छा मैनेजमेंट खराब से खराब बिजनेस को अच्छा कर सकता है और खराब मैनेजमेंट अच्छे स्थापित बिजनेस को चौपट कर देता है। बैड मैनेजमेंट के साथ निवेश करना अपने दुश्मन के साथ सोने जैसे है, कभी भी विश्वासघात कर सकता है। इसलिए मैनेजमेंट का अच्छा होना बहुत जरूरी है। सबसे अधिक स्टडी भी मैनेजमेंट पर करना चाहिए। मैनेजमेंट की कौन कौन सी कंपनियां है, सभी के प्रदर्शन कैसे है, कोई कम्पनी संकट में तो नहीं है, मैनेजमेंट पर पहले से कोई दगाबाजी का आरोप तो नहीं लगा है आदि सभी का अध्ययन करने के उपरांत ही कोई निर्णय लेना चाहिए। 

4) मार्केट कैपिटल कितना है
कंपनियों को सामान्यतया 4 भागों में बांटा गया है लार्ज कैप, मिडकैप, स्माल कैप और माइक्रोकैप। लार्ज कैप में जोखिम सबसे कम होता है और इनका बिजनेस स्थापित होता है। सामान्य तौर पर 20 हजार करोड़ से ऊपर की लार्ज कैप, 8 हजार से 20 हजार के मध्य मिडकैप, 300 से 8 हजार स्माल कैप और 300 करोड़ से नीचे माइक्रोकैप होते है। जैसे जैसे हम मार्केट कैपिटल के हिसाब से नीचे उतरते जाते है जोखिम भी उसी अनुपात में बढ़ता जाता है। विश्लेषण भी अधिक करना पड़ता है। मेरे अपना मत है कि अपने पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा 70 से 80 प्रतिशत तक लार्जकैप में रखनी चाहिए। वैसे मार्केट में तो हजारों कंपनियां लिस्ट है लेकिन सभी में निवेश नहीं किया जा सकता और न ही सभी उस क्वालिटी की है कि निवेश किए जाय। मुश्किल से 100/150 ऐसी कंपनियां है जो इन्वेस्टमेंट लायक है। हम सभी को अपने पसंद के स्टॉक चुनने चाहिए और उसी को फॉलो करना चाहिए। 

5) पीछे के रिटर्न कैसे है
मेरे लिए यह भी एक मानक है। हम स्टॉक मार्केट में इसलिए निवेश करने आते है कि बैंक और डाक की निवेश योजनाओं में मिलने वाले रिटर्न से हमें अधिक मिले और यदि कोई कम्पनी ऐसा नहीं कर रही है तो वो मेरे निवेश मानकों पर खरा नहीं उतरता। या मैं उस स्टॉक को तभी खरीदना पसंद करूंगा जब उस सेक्टर, उस कंपनी में कोई बुनियादी परिवर्तन होने जा रहा है। स्टॉक मार्केट में ग्रोथ मिलती है वो इनफ्लेशन और जीडीपी ग्रोथ रेट का योग होनी चाहिए। इस प्रकार 10/12% से उपर का प्रति वर्ष का रिटर्न होने चाहिए। 5 साल में कम से 50 प्रतिशत या 10 सालों में 100 प्रतिशत से ऊपर है तभी मैं ध्यान देता हूं। एक और चीज ध्यान देना है कि यह ग्रोथ नियमित होना चाहिए न कि सिर्फ एक ही साल का। इसके अतिरिक्त लॉन्ग टर्म में स्टॉक को निफ्टी और सेंसेक्स या अपने बेंच मार्क से ज्यादा रिटर्न देने चाहिए। कंपनी के पिछले 5 और 10 CAGR देख लेन सही रहेगा.

6) लिस्टिंग NSE पर है कि नहीं ?
हालांकि यह कोई मानक नहीं होता लेकिन मैं इसे भी देखता हूं। वो स्टॉक यदि केवल BSE पर लिस्टेड है NSE में नहीं तो फिर उसको देखता ही नहीं हूं। NSE पर वॉल्यूम ज्यादा होता है। मुझे लगता है कि NSE वाली कम्पनियों में क्वालिटी अधिक होती है हालांकि स्माल कैप लवर्स ज्यादातर बीएसई से स्टॉक चुनकर अच्छे रिटर्न प्राप्त करते है। 

7) वॉल्यूम कितना है
स्टॉक में दो चीजे बहुत महत्वपूर्ण होती है एक कीमत और दूसरा वॉल्यूम। वॉल्यूम मतलब प्रति दिन औसतन कितने स्टॉक्स इंडेक्स पर ट्रेड होते है। जितना कम वॉल्यूम उतना ही अधिक फंसने की आशंका और जितना ही अधिक वॉल्यूम मार्केट में एंट्री एक्जिट आसानी से हो जाता है। यहां सिर्फ वॉल्यूम ही मायने नहीं रखता है उसका प्राइस भी मायने रखता है क्योंकि वॉल्यूम ×प्राइस = टर्म ओवर बनेगा। टर्न ओवर जितना अधिक होगा वो शेयर उतना ही अधिक होगा। मैं नीचेेदिनांक 8.04.21 के  दो स्टॉक का उदाहरण लेने जा रहा हूं समझने के लिए एक एशियन पेंट और जेपी एसोसिएट का जहां जेपी का 3.24 करोड़ शेयर ट्रेड हुए है वहीं एशियन पेंट में लगभग 9 लाख। जेपी के वॉल्यूम ज्यादा है इसलिए सुरक्षित है लेकिन जरा इससे हटकर दूसरी तस्वीर देखिए टर्न ओवर जेपी का 8.30×3.24 करोड़ = लगभग 25 करोड़ वही एशियन पेंट का 2650×9 लाख = 238 करोड़। मेरे अनुसार एशियन पेंट के भाव को प्रभावित करने के लिए 238 करोड़ चाहिए जबकि जेपी को मात्र 25 करोड़। अब हमें प्रश्न यह पूछना है कि 25 करोड़ जुटाना आसान है या 238 करोड़ ..सही उत्तर दिया आपने 25 करोड़, 10/20 बड़े ट्रेडर मिल जाए तो जेपी को घूमा सकते है। 

8) P/E रेश्यो
बहुत मायने रखता है प्राइस अर्निंग रेश्यो जो बताता है कि शेयर महंगा है या सस्ता। PE जितना अधिक शेयर उतना ही अधिक महंगा और PE जितना ही कम शेयर उतना ही अच्छा समझा जाता है। सामान्य तौर पर जिस स्टॉक को हम देख रहे है उसका PE लेवल सेक्टर से कम है या अधिक। यह भी देखा जाता है कि लार्ज कैप और ब्लूचिप कंपनियों की PE बहुत अधिक होती है क्योंकि मार्केट को उस पर भरोसा बहुत अधिक होता है लोग ज्यादा खटीदना पसंद करते है जिससे अक्सर वो महंगे पर मिलती है। PE पर एक अलग से लेख पर बात की जाएगी।  PE के साथ साथ और भी कई फैक्टर देखे जाते है। 

9)P/B यानी प्राइस बुक वैल्यू का रेश्यो 
यह भी PE रेश्यो की तरह ही होता है। बुक वैल्यू मतलब एक शेयर की वैल्यू कितनी है। सामान्य भाषा में बात करे तो कम्पनी की सारी संपत्ति बेच दी जाए तो एक शेयर के हिस्से में कितना रुपया आएगा, बुक वैल्यू होता है। यह भी जितना ही कम होता है उनता ही अच्छा समझा जाता है। बेंजामिन ग्राहम के सिद्धांतों को अपनाया जाय तो PE रेश्यो और PB रेश्यो का गुणनफल 22 के आस पास रहे तो कम्पनी को खरीदना सही रहता है। ये वैल्यू इन्वेस्टर के लिए होता है। एक सामान्य तौर पर यदि PB 10 के नीचे है तो सही रहेगा। 

10) डिविडेंड देती है या नहीं 
डिविडेंड किसी भी निवेशक के लिए पैसिव इनकम की तरह होता है। लगभग 1% डिविडेंड यील्ड होता है तो मैं कम्पनी को ठीक समझता हूं। हालांकि ज्यादा डिविडेंड देना कंपनी के अच्छा होने का मानक नहीं होता है। यदि कम्पनी डिविडेंड देने के बजाय उन्हें बिजनेस में इन्वेस्ट करती है तो स्टॉक और बढ़ते है। 

11) ROCE और ROE 
इसका सामान्य सा आशय है कि यदि कम्पनी 100 रुपया निवेश करती है तो उस पर कितना कमा लेती है। ये दोनो 15 के उपर होने चाहिए। ये जितना ही अधिक होते है कम्पनी उतना ही बढ़िया समझी जाती है। निवशकों के लिए अच्छा पैसा बनाकर देती है। 
 
12)ROA
हालांकि ROA यानी रिटर्न ऑन एसेट को कम लोग देखते है लेकिन इसे मैं एक मानक के तौर पर देखता हूं। यह भी यदि 10% के आस पास या इसके ऊपर होता है तो सही रहता है। 

13) डेट इक्विटी रेश्यो
कर्ज बहुत मायने रखता है। कर्ज जितना ही अधिक कम्पनी पर प्रेशर उतना ही अधिक होता है। डेट इक्विटी रेश्यो .50 से कम हो तो सही रहता है।
  कई बार कर्ज अच्छा भी होता है क्योंकि कम्पनियों की ग्रोथ होती है, लेकिन यदि कम्पनी की बार बार कर्ज लेने की आदत होती है, और कर्ज लगातार बढ़ रहा है तो सतर्क हो जाना चाहिए। अभी वर्तमान में अदानी ग्रुप पर बुरी तरह से कर्ज बढ़ रहा है निवेशकों को सतर्क हो जाना चाहिए। एक समय अनिल अंबानी समूह की भी यही दशा रही। 
 
14) ईपीएस पाजिटिव होना चाहिए 
ईपीएस मतलब अर्निंग पर शेयर, यानि वो कंपनी एक शेयर पर कितना कमाती है, यह पॉइंट और पॉइंट 15 के बारे बारे में गंभीर होकर विचार करना है वो ये कि जब कंपनी खुद प्रॉफिट कमाएगी तभी शेयर धारकों को देगी. इसके लिए ईपीएस पर ध्यान देना बहुत जरुरी है, इसके साथ यह भी ध्यान देना है कि हर साल बढ़ रहा है कि नहीं, हर साल बढ़ना जरुरी है.

15)PAT मारीजिन
  लाभ का कितना कमा लेती है. कम से कम 10% या इससे अधिक हो तो वो कंपनी अच्छा लाभ कमाती है जिसके उसके  शेयरों के मूल्य में दिखता है. PAT मारीजिन के साथ साथ उसके लाभ कितना कमा रही है, पर भी ध्यान देना है. पीछे के सालों से लाभ के आकड़ें पर ध्यान देना चाहिए लाभ भी लगातार बढ़ना चाहिए और यदि कहीं लाभ गिरा है तो किस कारण से गिरा है, पर भी ध्यान देना चाहिए. कभी कभी किसी कंपनी के रिजल्ट में अचानक लाभ दिखने लगता है तो हमें सतर्क होकर उसका मूल्याङ्कन करना चाहिए कि वो लाभ कहाँ से हुआ है, कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने अपनी कोई संपत्ति बेच कर लाभ बढ़ाया है. लाभ उसके परंपरागत बिजनेस से आना चाहिए . इन सभी चीजों के लिए कंपनियों के आने वाले रिजल्ट पर ध्यान अवश्य देना चाहिए और कुछ आकड़ों में आसामान्य दिखे तो सतर्क हो जाना चाहिए.

16) कंपनी के सेल्स बढ़ रहे है या नहीं 
समय के साथ कंपनियों के सेल्स भी बढ़ने चाहिए, इसके लिए उसके पीछे के सालों विशेषकर 5/3 सालों से सेल्स के आकडे को देखना चाहिए कि वो बढ़ रहे है कि बढ़ रहे है तो कितने  % से बढ़ रहे है. मेरे विचार से यह भी 10% या इसके ऊपर हो तो कंपनी के साथ निवेशित रहना अच्छा रहता है

17) शेयर होल्डिंग पैटर्न 
एक और मानक है जिसका कंपनी पर बहुत असर होता है. इसमें सबसे अधिक जरुरी होता है प्रोमोटर की होल्डिंग देखना, जिस कंपनी में 50% से अधिक प्रोमोटर की होल्डिंग होती है वो कंपनी सही मानी जाती है लेकिन यदि इस मानक को माना जाय तो HDFC, इनफ़ोसिस, ITC जैसे स्टॉक हम नहीं लेंगे. आज की परिस्थितियों में कम्पनियाँ बिजनेस बढाने के लिए पैसा उगाहने पर ज्यादा जोर दे रही है इसलिए वो अपनी हिस्सेदारी कम कर देती है तो यहाँ पर हमें ध्यान देना है कि जो होल्डिंग बढ़ रही है वो किधर बढ़ रही है, यदि संस्थागत निवेशकों जैसे FII, DII, म्यूच्यूअल फण्ड आदि की हिस्सेदारी बढ़ रही है तो अच्छी बात है दूसरी तरफ यदि रिटेल निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़ रही है तो सतर्क हो जाना चाहिए. संस्थागत निवेशकों की एक रिसर्च टीम होती है जो कंपनियों को बाकायदा ठोक बजाकर ही खरीदारी करती है, प्रायः वो कमजोर कंपनियों में निवेश नहीं करते है. और भी बहुत बाते होती है. इसलिए यदि प्रोमोटर होल्डिंग कम हो तो संस्थागत निवेशकों की हिसेदारी अधिक होनी चाहिए तभी निवेश करने चाहिए.

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